जो तुम होती पूर्णमासी के चाँद के माफिक - हिंदी कविता में एक लड़की को विभिन्न उपमाओं के साथ कल्पित किया गया है.

जो तुम होती
पूर्णमासी के चाँद के माफिक
एकटक निहारता रहता तुम्हे
प्यासे चकोर के जानिब।

जो तुम होती
स्निग्ध, शीतल चाँदनी में
दिल से महसूस करता तुम्हे
अपनी साँसों की रागिनी में।

जो तुम होती
समुन्दर की हिलोरे मारती लहर बनकर
किनारे की रेत पर
महसूस करता तुम्हे गंगाजल समझकर।

जो तुम होती
नीर से भरा हुआ एक श्याम वर्णी बादल
मयूर की तरह
पंख फैलाकर नाच-नाच कर हो जाता पागल।

जो तुम होती
दूर समुन्दर के एक जजीरे जैसी खूबसूरत
जब मिलनें को दिल चाहता
तुम्हे पुकारता लेकर दीवानी सी सूरत।

जो तुम होती
एक बदली, घनघोर बरसती हुई
समेटता रहता तुम्हे शुष्क रेत में
जो रहती पानी के लिए तरसती हुई।

जो तुम होती
हिमगिरी पर बिखरी श्वेत, कोमल हिम बनकर
दिल की गहराइयों से
तुम्हारी एक मूरत बनाता सिर्फ तुम्हे यादकर।

जो तुम होती
पहाड़ पर टकराती हुई स्वछंद बदली की तरह
अंक में भर लेता तुम्हे
गगनचुम्बी, दृढ़, निश्चयी पहाड़ की तरह।

जो तुम होती पूर्णमासी के चाँद के माफिक

जो तुम होती
डूबते सूरज की मनमोहक लालिमा बनकर
दूर किसी पेड़ की ओट से
एकटक देखता रहता तुम्हे ओझल होने तक।

जो तुम होती
एक निस्वार्थ जलती हुई शमा की तरह
तुममें समाकर जल जाता
शमा के दीवानें परवानें की तरह।

जो तुम होती
मंद-मंद बहती हुई पुरवाई बयार की तरह
दोनों बाहें फैलाकर
अंक में भरनें की कोशिश करता दीवानों की तरह।

जो तुम होती
किसी खिले हुए सुमन की तरह
मैं तुममें ही घुल मिल कर
शामिल रहता तुम्हारी सुगंध की तरह।

जो तुम होती
एक लहराती अधखुली कलि बनकर
किसी को तुम्हारे पास
नहीं आने देता भंवरे की तरह गुनगुनाकर।

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