19
Fri, Jan

श्री महावीर दल श्रीमाधोपुर कस्बे में दरवाजे वाले बालाजी के सामने स्थित है तथा इसे “अखाड़ा” के नाम से भी जाना जाता है। अपनी स्थापना के समय से ही यह मुख्यतया सामाजिक तथा धार्मिक कार्यों के साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बंधित गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। इन्ही कार्यों की वजह से इसने स्वास्थ्य सुधार व स्वास्थ्य चेतना को घर-घर तक पहुँचाकर सभी को स्वास्थ्य तथा सेवा के लिए जागृत किया। इन्ही जनकल्याणकारी कार्यों की वजह से कस्बे के साथ-साथ सुदूर क्षेत्रों तक इसकी बहुत ख्याति है।

जब कभी भी महाभारत के युद्ध का जिक्र होता है तो हमारे मन मष्तिष्क में पांडवों, कौरवों तथा भगवान श्री कृष्ण का ख्याल उभर जाता है या फिर अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, दुर्योधन, कर्ण, भीष्म आदि योद्धाओं का नाम यकायक ही हमारे मन में उभर आता है। परन्तु महाभारत में कुछ ऐसे योद्धा भी थे जो अगर युद्ध में भाग लेते तो युद्ध का नक्शा कुछ और ही होता, इनमे से एक योद्धा का नाम था बर्बरीक। ये एक ऐसे योद्धा थे जिनके पास एक तीर से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य था।

श्रीमाधोपुर शहर में दरवाजे वाले बालाजी से कुछ आगे जाने पर एक ऐतिहासिक बावड़ी स्थित है जो कि इस कस्बे की ही नहीं वरन आस पास के पूरे क्षेत्र की एकमात्र बावड़ी है। आस पास के क्षेत्रों में इस बावड़ी के अतिरिक्त दूसरी कोई बावड़ी नहीं है। किसी जमाने में श्रीमाधोपुर से गुजरने वाले राहगीरों के विश्राम तथा उनके लिए जल की व्यवस्था करने हेतु श्री मोतीलाल कायथवाल द्वारा 1787 में एक तिबारी तथा बावड़ी का निर्माण करवाया गया। इन दोनों के साथ ही साथ बालाजी के एक मंदिर का भी निर्माण करवाया गया।

जयपुर नगर की स्थापना 1727 ईसवी में सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा की गई थी। सवाई माधोसिंह प्रथम (1750 से 1768 ) के शासन काल में हाँसापुर तथा फुसापुर, जिनको वर्तमान में हांसपुर तथा पुष्पनगर के नाम से जाना जाता है, के सामंतो ने विद्रोह करके कर देना बंद कर दिया था। महाराजा सवाई जयसिंह ने इन विद्रोही सामंतो का दमन करने के लिए अपने प्रधान दीवान नोपपुरा निवासी बोहरा राजा श्री खुशाली राम जी को सैन्य टुकड़ी के साथ भेजा था। उस समय दीवान वित्तीय कार्य करने के अतिरिक्त सैन्य अभियानों में भी भाग लिया करते थे।

श्रीमाधोपुर उपखंड क्षेत्र में स्थित मूंडरु कस्बा शेखावाटी अंचल का एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ का इतिहास अति प्राचीन होकर सीधा-सीधा महाभारतकालीन युग से जुड़ा हुआ है। पौराणिक धर्मग्रंथों व साहित्यों में इसे धर्म नगरी यानि छोटी काशी के नाम से जाना जाता था जो इस कस्बे की प्राचीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इतिहासकारों के अनुसार महाभारतकालीन गौरव गाथाओं से जुड़े कस्बे को ठाकुर हरदयरामजी ने संवत 1616 में बसाया था।

गोपीनाथ जी का मंदिर अति प्राचीन है तथा इसकी स्थापना श्रीमाधोपुर कस्बे की स्थापना के समय ही हुई थी। इसकी नींव बोहरा राजा खुशाली राम जी द्वारा नगर की स्थापना के समय ही अक्षय तृतीय के दिन 1761 में रखी गई। इस मंदिर के निर्माण में उच्च कोटि के कारीगरों तथा शिल्पकारों का बहुत योगदान रहा है तथा मंदिर वास्तुकला का एक बेजौड़ उदहारण है। मंदिर में कई शैलियों के भित्ति चित्र उकेरे गए जो ढूँढाड, जयपुरी तथा किशनगढ़ शैलियों से प्रभावित थे क्योंकि उस वक्त इन्ही शैलियों का चलन अधिक था।

श्रीमाधोपुर डॉट कॉम वेबसाइट का प्रमुख उद्देश्य श्रीमाधोपुर, रींगस, अजीतगढ़, खाटूश्यामजी, खंडेला तथा इन शहरों से लगने वाली तहसीलों के व्यापारियों, पेशेवरों तथा निवासियों के लिए सभी तरह की सूचना एक क्लिक पर उपलब्ध करवाना है। यह वेबसाइट इस क्षेत्र से सम्बंधित लेटेस्ट न्यूज तथा ऑनलाइन बिजनेस डायरेक्टरी के क्षेत्र में सक्रिय है।

श्रीमाधोपुर नगर की स्थापना 1761 ईस्वी में वैशाख शुक्ल तृतीय (अक्षय तृतीय) के दिन जयपुर राज दरबार के प्रधान दीवान बोहरा राजा श्री खुशाली राम जी ने ऐतिहासिक खेजड़ी के वृक्ष के नीचे की थी। यह खेजड़ी का वृक्ष आज भी चौपड़ बाजार में शिवालय के पीछे बालाजी के मंदिर के निकट स्थित है।

Sign up via our free email subscription service to receive notifications when new information is available.