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व्यापार में भागीदार बनते हैं चित्तौड़गढ़ के सांवलिया सेठ - ऐसा माना जाता है कि नानी बाई का मायरा भरने के लिए स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने सांवलिया सेठ का रूप धरा था.

चूँकि भगवान का यह रूप एक व्यापारी का था इसलिए इनकी ख्याति व्यापार जगत में काफी फैली और अनेक व्यापारी अपने व्यापार को बढाने के लिए इन्हें अपना पार्टनर बनाने लगे. ये व्यापारी अपने व्यापार में हुए लाभ का एक निश्चित हिस्सा प्रतिवर्ष सांवलिया सेठ के मंदिर में भेंट करते हैं. वर्षों से यह परंपरा चलती आ रही है.

सांवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से भी बताया जाता है. जनश्रुतियों के अनुसार मीरा बाई जिन गिरधर गोपाल की मूर्ति की पूजा किया करती थी वो सांवलिया सेठ की ही मूर्ति हैं. मीरा बाई संत महात्माओं के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहती थी. मीरा बाई के पश्चात ये मूर्तियाँ उनकी धरोहर के रूप में दयाराम नामक संत के पास थी.

जब औरंगजेब की मुगल सेना मंदिर तोड़ते-तोड़ते मेवाड़ पहुँची तो संत दयाराम ने इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा की छापर (खुला मैदान) में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोद कर छुपा दिया. समय बीतने के साथ संत दयाराम का देवलोकगमन हो गया और ये मूर्तियाँ उसी स्थान पर दबी रही.

कालान्तर में वर्ष 1840 में मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नामक ग्वाले द्वारा उस जगह पर खुदाई की गई तो वहाँ पर एक जैसी तीन मनोहारी मूर्तियाँ निकली. खबर फैलने पर आस-पास के लोग प्राकट्य स्थल पर पहुँचने लगे. फिर सर्वसम्मति से सबसे बड़ी मूर्ति को भादसोड़ा ग्राम में प्रसिद्ध गृहस्थ संत पुराजी के पास ले जाया गया.

संत पुराजी के निर्देशन में उदयपुर मेवाड़ राज-परिवार के भींडर ठिकाने की ओर से सांवलिया जी का मंदिर बनवाया गया. सांवलिया सेठ का यह मंदिर सबसे पुराना मंदिर है इसलिए इसे सांवलिया सेठ के प्राचीन मंदिर के नाम से जाना जाता है.

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मंझली मूर्ति को वहीं खुदाई की जगह स्थापित किया गया जिसे प्राकट्य स्थल मंदिर के नाम से जाना जाता है. सबसे छोटी मूर्ति भोलाराम गुर्जर द्वारा मंडफिया ग्राम ले जाई गई. कालांतर में इन तीनों जगहों पर भव्य मंदिर बनते गए. तीनों मंदिरों की ख्याति भी दूर-दूर तक फैली. आज दूर-दूर से लाखों यात्री प्रति वर्ष श्री सांवलिया सेठ दर्शन करने आते हैं.

वर्तमान में ये तीनों मंदिर आपस में मात्र पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इन तीनों मंदिरों में से मण्डफिया के सांवलिया सेठ का मंदिर सबसे अधिक प्रसिद्ध है. इसे सांवलिया धाम के नाम से जाना जाता है.

वैष्णव भक्तों की संख्या के हिसाब से यह मंदिर नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर के बाद दूसरे स्थान पर आता है. 

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