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रानी सती दादी की कहानी - पौराणिक मान्यता के अनुसार जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त हो गए थे तब अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने अभिमन्यु की चिता के साथ सती होने का निर्णय लिया.

भगवान कृष्ण ने उत्तरा को सती होने से रोका, तब उत्तरा ने उनसे अगले जन्म में अभिमन्यु की पत्नी बनने की विनती की. तब भगवान कृष्ण ने उत्तरा को वरदान दिया कि उसकी यह इच्छा कलयुग में पूरी होगी और तब वह नारायणी के नाम से विख्यात होगी.

भगवान कृष्ण के उसी वरदान के फलस्वरूप आज से सात सौ वर्षों से भी अधिक समय पूर्व उत्तरा का जन्म डोकवा (Dokwa) गाँव के सेठ गुरसामल (Gursamal) की पुत्री नारायणी (Narayani) के रूप में और अभिमन्यु का जन्म हिसार के सेठ जालीराम (Jaliram) के पुत्र तनधन (Tandhan ) के रूप में हुआ.

नारायणी बाई को बचपन में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ युद्ध कला और घुड़सवारी की शिक्षा भी दी गई थी. बचपन से ही इनमे कई चमत्कारी शक्तियाँ नजर आती थी.

युवावस्था में नारायणी बाई का विवाह तनधन के साथ संपन्न हुआ. तनधन घोड़ों का व्यापार करते थे. इनके यहाँ राणाजी (Caretaker of Horse) नामक व्यक्ति घोड़ों की देखभाल का कार्य करता था.

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हिसार के राजकुमार को इनके घोड़ों में से एक घोडा पसंद आ गया. उसने तनधन से घोडा देने को कहा जिसे तनधन ने ठुकरा दिया. जबरन घोड़े को ले जाने की बात पर राजकुमार और तनधन में युद्ध हुआ जिसमे राजकुमार मारा गया.

जब राजा को अपने पुत्र के मारे जाने का पता चला तो वह सेना लेकर तनधन के पास आया और उसने नारायणी के सामने तनधन की हत्या कर दी. नारायणी को क्रोध आ गया और उसने माँ दुर्गा की भाँति प्रचंड रूप धारण कर राजा और उसके सभी सैनिकों को मार डाला.

इसके पश्चात नारायणी बाई ने अपने पति के साथ सती होने का संकल्प लेकर राणाजी से इसका प्रबंध करने को कहा.

राणाजी ने नारायणी की इस इच्छा का पालन किया जिससे प्रसन्न होकर नारायणी ने राणाजी को आशीर्वाद दिया कि भविष्य में सती के नाम से पहले उसका नाम लिया जाएगा. इसी आशीर्वाद के फलस्वरूप सती के नाम के पहले राणी (रानी) लगाया जाता है.

तत्पश्चात विक्रम संवत् 1352 (1295 ईस्वी) में मंगसिर शुक्ल नवमीं के दिन नारायणी ने सती होकर देवलोक गमन किया.

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