ब्रिटिश चुनाव में भारतीयों की भूमिका - हाल ही में संपन्न हुए, ब्रिटेन के बहुप्रतीक्षित और ऐतिहासिक आम चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर तमाम राजनीतिक पंडितों और पर्यवेक्षकों के बीच एक नए राजनीतिक अध्याय की बहस को जन्म दिया.

आमतौर पर किसी क्षेत्र के चुनाव स्थानीय व मूलभूत समस्याओं से ही संबंध रखते हैं और अगर इस दायरे को बढाकर किसी व्यापक एवं विविध भौगोलिकता वाले राष्ट्र के सन्दर्भ में देखा जाए तो कुछ हद तक राष्ट्रीय हित चुनाव को प्रभावित करते हैं.

मतदाताओं को अपनी और आकर्षित करने की इस भागमभाग में राजनीतिक दलों की नीतियाँ व विचारधाराएँ थोड़ी दूर खड़ी नजर आती हैं. ब्रिटेन के उक्त चुनाव, इसके यूरोपियन संघ (EU) से अलग होने व एवं उसके दूरगामी प्रभावों के परिणामों व संभावनाओं पर लड़े गए थे.

चुनावों के परिणामों में निवर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की अगुवाई वाली कंजरवेटिव पार्टी ने 650 निर्वाचन क्षेत्रों वाले ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ (ब्रिटिश संसद) में आवश्यक बहुमत से अधिक 365 सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि मुख्य विपक्षी दल लेबर पार्टी को महज 203 सीटों से संतोष करना पड़ा.

नतीजों में भारी हार के बाद विपक्षी नेता जेरेमी कॉर्बिन ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए लेबर समर्थकों से माफी भी मांगी. चुनाव-पूर्व प्रचार में कॉर्बिन व लेबर पार्टी को अपेक्षा से अधिक मिले समर्थन ने इन चुनावों को काफी रोचक बनाया था और तरह-तरह की संभावनाओं को भी जन्म दिया, लेकिन एकतरफा चुनाव परिणामों ने उस ‘हवा’ को पहले ही रोक दिया.

ब्रिटिश चुनाव में भारतीयों की भूमिका

इन चुनावों में इंग्लैंड में निवास कर रहे आप्रवासी ‘भारतीयों’ ने भी अहम भूमिका निभाई, जे. कॉर्बिन ने कश्मीर मुद्दे पर कश्मीर में एक ‘अन्तर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक’ की नियुक्ति की मांग की थी, जो बात वहाँ रह रहे ‘भारतीयों’ को रास नहीं आई.

इसके चलते भारतीयों ने बड़ी तादाद में कंजरवेटिव पार्टी को खुला समर्थन दिया और कुछ हद तक इन मतों ने भी हार-जीत का फासला बढ़ाया. वहीँ अन्तर्राष्ट्रीय व कूटनीतिक स्तर पर भी ये चुनाव परिणाम भारतीय दृष्टिकोण से काफी सुखद रहे. यूँ तो प्रारंभ से ही भारत-ब्रिटेन सम्बन्ध मधुर रहे हैं और इन परिणामों से दोनों देशों के रिश्तों में प्रगाढ़ता आएगी.

खैर, ये चुनाव विश्व पटल पर आम जनमानस के बीच वामपंथ की घटती प्रासंगिकता का भी परिचायक बने. समय की गतिशीलता के साथ बदले वामपंथ चरित्र ने अपनी जड़ों को छोड़कर जो नई कार्यशैली अपनाई है वो शायद कहीं न कहीं परंपरागत मतदाताओं को पसंद नहीं आई, जिससे उन्होंने भी अपना रास्ता बदला है.

वामपंथी दलों को अब उस नव-सृजन की आवश्यकता है, जिससे वो आमजन के मध्य अपना खोया हुआ जनाधार हासिल कर सकें. इन सब तथ्यों व वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व राजनीति के चलते ब्रिटेन के आम चुनाव आने वाले समय में शोधार्थियों के लिए गहन अध्ययन व शोध का विषय रहेंगे.

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