नीरस दिवाली के बीच याद आती पुरानी यादें - इस बार दिवाली की रात को श्रीमाधोपुर के बाजारों में घूमने का मौका मिला तो बरबस ही लगभग बीस वर्ष पूर्व की दिवाली की याद ताजा हो उठी.

ऐसे लगा जैसे वक्त थम गया हो और मैं उस पुराने समय में पहुँच गया हूँ. जेहन में वो पुराना मंजर घूमने लगा. गलियों और मुख्य बाजारों की सड़कों से गुजरते समय आँखें कुछ ढूँढने लग गई.

ऐसा लग रहा था जैसे इन गलियों में से निकलकर कोई ना कोई दोस्त अभी सामने आकर खड़ा हो जाएगा और अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ बोल उठेगा “दिवाळी की राम राम भाई”.

मेरी आँखों के सामने वो पुराना मंजर घूमने लग गया. आँखों के सामने से एक-एक दोस्त गुजकर पुस्तकालय की सीढ़ियों के पास जाकर इकठ्ठा होने लग गए. फिर हल्की फुल्की आतिशबाजी के साथ श्रीमाधोपुर की गलियों में विचरण करते हुए चौपड बाजार में इकठ्ठा होकर रोशनी और आतिशबाजी का नजारा करने लगे.

इस बार मुख्य बाजारों में किसी को भी आतिशबाजी करते हुए नहीं देखा जबकि उस समय सारी की सारी आतिशबाजी मुख्य बाजारों में ही हुआ करती थी. शायद, चौपड़ बाजार आतिशबाजी का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. यहाँ पर जमकर आतिशबाजी हुआ करती थी.

सभी दुकानदार, खासकर कपड़ों के व्यापारी सभी को अपनी दुकान से दूर आतिशबाजी करने के लिए कहा करते थे. परन्तु मुझे अभी भी अच्छी तरह से याद है कि जितनी आतिशबाजी बाजारों में होती थी उसका कुछ प्रतिशत ही गलियों में हुआ करती थी. दुकानें देर रात तक खुला करती थी.

बाजारों की रौनक ही कुछ अलग हुआ करती थी. व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों को दुल्हन की तरह सजाया करते थे. दिवाली की रात मुख्य बाजारों में जमकर भीड़ हुआ करती थी. दोस्तों के साथ आतिशबाजी करने के बाद देर रात तक चाय की दुकान पर बैठकर चाय पीने का मजा शायद अमृत पीने जैसा महसूस होता था.

नीरस दिवाली के बीच याद आती पुरानी यादें

आज जब वो पल नहीं है तब यह अधिक आभास होता है कि हमने जीवन की इस आपाधापी में क्या कुछ खो दिया है. हमने दोस्तों के साथ-साथ उस अनमोल समय को भी खो दिया है जो हमें अब कभी भी नहीं मिलने वाला है.

वक्त के साथ-साथ हम अपना अल्हड़पन खोकर तथाकथित रूप से शिष्टाचारी हो गए हैं. हमारा बस चले तो हम अपने साये के साथ भी शिष्टाचार का ही व्यवहार करें.

बचपन हमारे जीवन रुपी रंगमंच का वो गुजरा हुआ हिस्सा होता है जिसे याद तो किया जा सकता है परन्तु पुनः खेला नहीं जा सकता है. स्कूल के समय की दोस्ती और यादें कभी भी नहीं भुलाई जा सकती है. ऐसा नहीं है कि दोस्त बाद में नहीं बनते हैं. बनते हैं, परन्तु ये रिश्ते इमोशन से अधिक प्रोफेशनल होते हैं.

घर से मैं लगभग साढ़े सात बजे के आसपास दिवाली की रोशनी का नजारा करने निकला. बाजार में रोशनी देखने की शुरुआत रेलवे स्टेशन रोड पर स्थित उस स्कूल के सामने से की जहाँ मैंने बारहवीं तक की शिक्षा ग्रहण की थी. उस स्कूल के सामने सन्नाटा पसरा पड़ा था. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि आज दिवाली की रात है.

शनिदेव के मंदिर के सामने पानी की टंकी है वहाँ पर दस बारह दिए जलते हुए नजर आये. आगे आने पर राजस्थान पत्रिका वाले महेंद्र जी अपने स्टूडियो के पास मिले तथा आसपास दस पंद्रह लोग किसी राजनेता का इंतजार करते नजर आए.

आगे आने पर सरकारी अस्पताल के सामने भी माहौल ज्यादा दिवालीमय नजर नहीं आया. खटोडा बाजार में तीन चार दुकानों पर सजावट दिखी. सरकारी अस्पताल के सामने एक पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी को अंजाम देता नजर आया.

राजपथ पर सरकारी अस्पताल से नगरपालिका के आगे तक दो तीन दुकानों पर ही सजावट मिली. नगरपालिका के भवन पर भी बड़ी साधारण सी सजावट थी. बस स्टैंड लगभग अमावास के अन्धकार में डूबा हुआ नजर आया. बस स्टैंड का अँधेरे में डूबा रहना आश्चर्यचकित कर रहा था. गोपीनाथजी के मंदिर पर थोड़ी सजावट दिखी.

रींगस बाजार में भी दो चार दुकानों पर कुछ सजावट दिखी. चौपड़ बाजार में हाई मास्क लाइट की वजह से काफी रोशनी हो रही थी. बाकी सजावट के नाम पर यहाँ भी कुछ खास नहीं था. किसी जमाने में यह बाजार पूरी तरह से गुलजार रहा करता था. चार पाँच पुलिसकर्मी यहाँ पर भी अपनी ड्यूटी को अंजाम देते नजर आए.

सीकर बाजार ने इक्का दुक्का दुकानों को छोड़कर, पुराने समय की तरह ही वीरानी की चादर ओढ़ रखी थी. यह बाजार अब शायद पार्किंग और सभाओं के ज्यादा काम आता है. सुरानी बाजार में सजावट का तो हाल लगभग और जगह जैसा ही था परन्तु यहाँ पर रौनक और बाजारों से अधिक लगी.

सीतारामजी मंदिर के बाहर पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष हरिनारायण महंत अपने वर्षों पुराने अंदाज में बैठे दिखे. लोग इनसे मिलकर इनका आशीर्वाद ले रहे थे. इनके जिंदादिल स्वभाव के कारण ये जहाँ बैठते हैं वहाँ रौनक और माहौल अपने आप बन जाता है.

नीरस दिवाली के बीच याद आती पुरानी यादें

थोड़ी देर में यहाँ पर क्षेत्रीय विधायक दीपेन्द्र सिंह शेखावत के पुत्र एवं कांग्रेस पार्टी के प्रदेश सचिव बालेन्दु सिंह शेखावत बीस पच्चीस लोगों के साथ स्थानीय दुकानदारों को दिवाली की शुभकामनाएँ देते दिखे.

खंडेला बाजार में भी कुछ दुकानों के अतिरिक्त हालात जुदा नहीं थे. पीएनबी बैंक के तिराहे (गडगडा मोड़) से लेकर गोशाला बाजार तक भी अँधेरा ज्यादा रोशनी कम नजर आई. गोशाला तिराहे पर हाई मास्क लाइट की वजह से रोशनी काफी थी.

तिराहे पर दो पुलिसकर्मी ड्यूटी पर मौजूद थे. यहाँ से गणेशजी के मंदिर की तरफ जाने वाली रोड को देखने पर भी मुझे वैसे ही हालात होने का आभास हुआ और मैं यहाँ से आगे नहीं गया.

श्रीमाधोपुर के मुख्य बाजारों में घूमने पर मुझे एक बात साफ नजर आई और वो यह थी कि इस बार सड़कों पर लोग ना के बराबर थे. पहले जहाँ सड़कें रोशनी देखने वालों से भरी रहती थी वहीँ अब सड़कों पर दुकानदारों के अतिरिक्त नाम मात्र के लोग नजर आ रहे थे. मैं लगभग साढ़े सात बजे से रात्रि दस बजे तक श्रीमाधोपुर के बाजारों में था.

आखिर क्या कारण है कि श्रीमाधोपुर में इस वर्ष दिवाली पर बाजारों में लोग नहीं थे? क्या ऐसा इस वर्ष ही हुआ है या फिर ऐसा काफी समय से होता आ रहा है? क्या आर्थिक मंदी ने त्यौहार को भी अपनी चपेट में ले लिया है या फिर त्यौहार की तरफ नई पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी का रुझान भी कम हो गया है?

बाजार में कुछ लोगों से बात करने पर मिली जुली प्रतिक्रिया मिली परन्तु बहुमत मंदी की तरफ अधिक रहा. कुछ लोगों ने बताया कि इस बार बाजार में मंदी छाई हुई है और मार्केट में बिक्री पिछले वर्ष के मुकाबले में एक चौथाई भी नहीं है.

एक दो लोगों ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से श्रीमाधोपुर में दिवाली पर लोगों का उत्साह इसी प्रकार कम होता जा रहा है. मुझे उनकी बात पर अधिक विश्वास नहीं हुआ क्योंकि मेरे जेहन में श्रीमाधोपुर वासियों की छवि ऐसे जिंदादिल लोगों के रूप में अंकित है जो हर त्यौहार को पूरी जिन्दादिली के साथ मनाते हैं.

इसका उदाहरण रावन दहन के कार्यक्रम में हजारों लोगों का कचियागढ़ स्टेडियम में उपस्थित होना है. श्रीमाधोपुर वासी इतने नीरस नहीं हो सकते कि वो इस प्रमुख त्यौहार को ढंग से न मनाए. हो ना हो इस फीकी दिवाली के पीछे जरूर कुछ आर्थिक कारण ही रहे होंगे.

वैसे नगरपालिका ने इस बार जीणमाता के मंदिर के सामने वाले चौराहे से शुरू कर गोपीनाथजी के मंदिर के सामने तक तथा यहाँ से चौपड़ बाजार से होकर खंडेला बाजार में आईसीआईसीआई बैंक के आगे गडगडा मोड़ तक सजावट के रूप में चमकीली फर्रियाँ बाँध रखी थी.

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