मेरी कमियाँ बताने वाले - इस कविता में उन भावनाओं को रेखांकित किया गया है जो गलत ना होते हुए भी गलत साबित करने की कोशिश के बाद उभरती है.

मेरी कमियाँ बताने वाले, मेरी खूबियाँ भी बताते तो कोई बात होती
गैरों को बताना ठीक नहीं था, मुझको बताते तो कोई बात होती

अपना दर्द सुनाने वाले, मेरा भी सुनाते तो कोई बात होती
सिक्के का एक पहलू ही दिखाया, दूसरा भी दिखाते तो कोई बात होती

घरेलू बातें दुनिया में बताना गलत है, इस बात को निभाते तो कोई बात होती
दूसरों पर मनमाफिक तोहमत लगाकर, इतना ना गिराते तो कोई बात होती

अपने माता पिता जैसी चिंता, सभी बुजुर्गों के लिए जताते तो कोई बात होती
दूसरे बुजुर्ग भी माँ बाप जैसे हो सकते हैं, अहसास जो कराते तो कोई बात होती

बहू भी बेटी बन सकती है, कभी बनके दिखाते तो कोई बात होती
सभी के साथ अपना रिश्ता, आत्मिक सा बनाते तो कोई बात होती

हैसियत अपने घर की बहुओं की, निष्पक्षता से तौल पाते तो कोई बात होती
बहुएँ तो सिर्फ काम करने के लिए होती है, यह सोच बदल पाते तो कोई बात होती

अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीना गलत नहीं है, कहके दिखाते तो कोई बात होती
अपने लिए इसे जायज और दूसरों के लिए नाजायज, ना ठहराते तो कोई बात होती

उकसाने के बजाये बुजुर्गों को भी, गलती का अहसास कराते तो कोई बात होती
तुम रिश्तों में सेतु बन सकते थे, कभी बनके दिखाते तो कोई बात होती

Written by:
Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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