लोकतंत्र में सभी की भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित हो - किसी भी राष्ट्र अथवा राज्य के चहुंमुखी विकास में संदर्भित संस्था के अनेक आधिकारिक, अनाधिकारिक तथा अन्य छोटे समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

उदाहरण के लिए, सरकार, न्यायपालिका, कानून व शांति व्यवस्था के निर्धारण हेतु पुलिस, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में नौकरशाही एवं स्थानीय स्तर पर बहुतायत में मौजूद अनेक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) कई तरीकों से अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए एक विशेष तंत्र का निर्माण करते हैं.

चूंकि एक तंत्र के स्वरूप गुणवत्तायुक्त कार्य निष्पादन हेतु यह आवश्यक हो जाता है कि ये सभी तत्व एक टीम के रूप में अपने-अपने दायित्वों व कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करें क्योंकि किसी भी एक संस्था की शिथिलता व निष्क्रियता पूरे तंत्र की विफलता का कारण बनकर सामने आते हुए राष्ट्र अथवा राज्य के विकास को अवरूद्ध कर सकती है.

इसी समावेशी सिद्धांत का उल्लेख लोक प्रशासन विषय में भी मुख्य रूप से किया गया है जो शोध व अध्ययन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है.

इसी कड़ी में जब हम उक्त सिद्धांत को हमारे देश के संदर्भ में रख कर देखते हैं तो हम पाते हैं कि भारत जैसे व्यापक भौगोलिक व सांस्कृतिक विविधता वाले क्षेत्र में यह बिंदु प्रगाढ़ रूप से अध्ययनपरक हो जाता है.

दरअसल, हमारे यहां समय-समय पर न्यायपालिका, कानून व्यवस्था एवं नौकरशाही के राजनीतिकरण का विषय जोरों-शोरों से उठता जिसकी एक हल्की झलक इन सभी तत्वों में वैचारिक मतभेद के रूप में उभर कर सामने आती है लेकिन इस खींचतान का परिणाम अंततोगत्वा आमजन को भुगतना पड़ता है जो इसका सबसे बुरा पहलू है.

लोकतंत्र में सभी की भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित हो

इसके अतिरिक्त देश की छवि को भी काफी हद तक क्षति पहुंचती है. हालांकि यहां ध्यातव्य ये है कि सभी पक्षों के ताने-बाने और भूमिका के निर्वहन लेकर आमजन में (विशेषतया राजनीतिक पर्यवेक्षकों) काफी हद तक मत विभाजन है जो कि जाहिर तौर पर एक अलग ही विषय है.

खैर, अब सवाल है कि तंत्र में मौजूद इस 'गंभीर' खामी को किस प्रकार दूर किया जाए? यह सवाल इसलिए 'गंभीर' हैं क्योंकि लोकतंत्र में इन सभी आवश्यक तत्वों की जवाबदेही जनता के प्रति पहले से तय होती है और वे चाहते हुए भी इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते.

ऐसे में सभी संस्थाओं को परस्पर सहयोग और सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है जिसकी शुरुआत नियमित बैठकों, पत्रों व सुझाव समितियों की सिफारिशों के माध्यम से विचारों के आदान-प्रदान स्वरूप हो सकती हैं.

निवारण की इसी श्रृंखला में सार्वजनिक मंचों पर सहयोग व समर्थन के रूप में 'संयुक्त समझौता घोषणा पत्र' भी जारी किए जा सकते हैं तथा इसी दौरान सबकी 'सार्वभौमिक सीमाएं' भी तय होनी चाहिए.

इन सभी उपायों के बाद भी अगर किसी चीज की आवश्यकता है तो वो है सभी संस्थाओं तथा हमें कदम से कदम मिलाकर चलने की और हमें उम्मीद है कि हम उसमें भी सफल होंगे.

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