नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उपेक्षित शिक्षक - 29 जुलाई 2020 की संध्या का आग़ाज व्हाट्सएप मैसेजों और समाचार चैनलों पर नई शिक्षा नीति की घोषणा के साथ हुआ.

आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाते भारत में 34 वर्षों बाद नई शिक्षा नीति आई. केंद्र में मोदी सरकार की उपलब्धियों के बहीखाते में एक पन्ना और जुड़ गया.

उपलब्ध आंकड़ों में दर्शाया गया है कि व्यापक स्तर पर सलाह-सुझाव-राय-मशवरा हुआ. जबकि वास्तविकता यह है कि शिक्षक समुदाय की आवाज शिक्षा मंत्रालय के अभेद किले को चीर ही नहीं पायी.

नई शिक्षा नीति दूर दृष्टि रखने वाले महान एवं अनुभवी शिक्षाविदों के अथक प्रयासों का श्री फल है, ऐसा दावा किया गया है. कैबिनेट की हरी झंडी से प्रफुल्लित एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा सत्यापित नवीन शिक्षा फल से 21 वीं सदी में भारत आत्मनिर्भरता के साथ पुन: शैक्षिक जगतगुरू की उपाधि से अलंकृत होगा, यह विश्वास प्रकट किया जा रहा है.

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उपेक्षित शिक्षक

नई शिक्षा नीति में हुये मूलभूत परिवर्तनों का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है. शिक्षित और साक्षर समुदाय में नई शिक्षा नीति की विवेचना ठीक उसी प्रकार से हो रही है, जैसे गाँव-कस्बों में 20-25 वर्ष पूर्व ब्याहता पुत्रवधु और 2020 में वैवाहिक बंधन में बंधे पुत्र की पत्नी की शिक्षा-दीक्षा और स्त्री धन (दहेज) की तुलनात्मक चर्चा होती है.

मोदी जी और योगी जी हैं इसलिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और राष्ट्र भाषा शिक्षण का माध्यम होगी, लेकिन शिक्षा के अन्य स्तरों पर राष्ट्र भाषा में शिक्षण - प्रशिक्षण की स्वतंत्रता क्यों नहीं दी गयी? इसका कारण स्पष्ट नहीं है.

एम. फिल. को समाप्त कर दिया गया है, वैसे भी इस उपाधि की स्थिति घर में रखे उस सामान जैसी थी, जिससे अतिथियों को अधिक साधन सम्पन्न होने का प्रमाण दिया जाता है.

उच्च शिक्षा में 1-2-3-4 वर्ष अर्थात 1 वर्ष में सर्टिफ़िकेट, 2 वर्ष में डिप्लोमा, 3 वर्ष में डिग्री और 4 वर्ष उपरांत स्नातकोत्तर में प्रवेश मिलेगा, लेकिन एक अनसुलझा प्रश्न है कि इस शिक्षा नीति में आखिर राष्ट्र के भावी नागरिकों एवं नीति निर्माताओं को नया क्या दे रहे हैं?

सनातन संस्कृति की आधारशिला नैतिक मूल्य तथा आचरण शिक्षा, नई शिक्षा नीति में कहीं दिखाई नहीं दे रही है. मनसा, वाचा, कर्मणा संस्कृत के शब्द हैं. मनसा का अर्थ है मन, वाचा का वाणी (बोलना) और कर्मणा का काम करना. योग में इसका अर्थ है अपनी ऊर्जा का सर्वोच्च उपयोग करना.

शिक्षा की सार्थकता एवं सफलता का मार्ग व्यावहारिक एवं प्रयोगात्मक अनुभव एवं क्रियात्मक अनुसंधान से प्रशस्त होता है. शैक्षिक वर्षों की अवधि के कम और अधिक किये जाने, उपाधियों के नामांकरण में बदलाव लाने और वार्षिक परीक्षाओं को सेमेस्टर में परिवर्तित करने से नहीं.

निश्चित रूप से इसमें शिक्षार्थियों को अधिक शैक्षिक स्वतंत्रता मिलेगी और निस्संदेह साक्षरता दर में भी बढ़ोतरी होगी, लेकिन इतिहास में अंकित विश्व गुरु की उपाधि को भारत पुन: वर्तमान के ललाट पर स्थापित कर सकेगा, इसमें संशय है.

नई शिक्षा नीति में एक ओर जहाँ वरदराज, कर्ण, अर्जुन, एकलव्य, आरुणी और चन्द्रगुप्त तुल्य ज्ञानपिपासुओं को आवश्यकता अनुसार बौद्धिक क्षमता एवं अभिरुचि आधारित शिक्षा प्राप्ति का विकल्प मिल गया (ऐसा दर्शाया जा रहा हैं) वहीं दूसरी ओर गुरु वशिष्ठ, संदीपनी, द्रोणाचार्य, चाणक्य और डॉ. राधाकृष्णन के वंशज शिक्षक स्वयं को इस नवीन शिक्षा नीति में खोज रहे हैं.

निरीह गाय सा शिक्षक डॉ. राधाकृष्णन जी का ऋणी है कि शिक्षक दिवस पर उनके कारण वर्ष में एक दिन ‘गंगू तेली, राजा भोज’ सा अभिभूत हो जाता है.

निर्भीकता के साथ लिखने का साहस कर रही हूँ कि नई शिक्षा नीति के निर्माण की योजना और सुझावों के लिए गैर सरकारी शिक्षक समुदाय को भागीदारी से वंचित और वर्जित रखा गया, व्यापक चर्चा और विचार-विमर्श नहीं हुआ.

ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता के गलियारों में सक्रिय रहने वाले समूह ही विचार-विमर्श में सम्मिलित थे. यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि शिक्षकों/प्रशिक्षकों की उपेक्षा, अनदेखी और अवमानना से शैक्षिक संरचना की जड़ें मजबूत नहीं अपितु खोखली होंगी.

नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम-2010 और नई शिक्षा नीति-2020 दोनों में ही शिक्षक की घोर अवहेलना की गयी है. शिक्षा मंत्रालय में विगत कई दशकों से कुशल नेतृत्व का अभाव रहा है, जिसके कारण शिक्षा में गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है.

9 महीने तक कोख में रक्त से सींचने वाली, स्तनपान से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली, परिश्रम, बुद्धि, विवेक और स्वानुभाव से ज्ञानर्पण द्वारा पालन-पोषण करने वाली माँ स्वरुपा शिक्षक समूह के सम्मान की रक्षा का दायित्व कल भी राज्य का था और आज भी राज्य का है, इसमें समाज की सहभागिता कहीं भी परिलक्षित नहीं होती.

दुर्भाग्यवश वर्तमान में अवसरवादिता, राजनीतिकरण तथा निजीकरण के कारण शिक्षक के स्वाभिमान का पग-पग पर शोषण और सम्मान का चीरहरण हो रहा है, लेकिन सुध लेने वाला कोई कृष्ण कहीं भी नजर नहीं आ रहा है.

Written by:
प्रो. डॉ. सरोज व्यास

(लेखिका, इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र की समन्वयक एवं फेयरफील्ड प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थान, नई दिल्ली में निदेशक पद पर कार्यरत हैं. इसके अतिरिक्त एसोशिएशन ऑफ ह्युमन राइट्स, नई दिल्ली के महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्षा एवं राष्ट्रीय स्लम फाउंडेशन की भविष्योदय पत्रिका के प्रधान संपादक का संचालन कर रही हैं.)

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