पौराणिक कथा - रक्षा-सूत्र का पुराणों में महत्व - सतयुग में विरोचन नाम का एक अत्यंत क्रूर एवं निर्दयी राक्षस था. उसके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उसने बलि रखा.

पिता के स्वभाव से विपरीत बलि पराक्रमी, बलशाली, धर्मात्मा एवं दानी था. बलि के पास एक समय तीनों लोकों (धरती, आकाश, पाताल) का राज्य था. वचन-बद्धता और धर्म-परायणता के कारण बलि देवताओं एवं दानवों के बीच प्रसिद्ध था.

उसी काल में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य तथा देवताओं के गुरु बृहस्पति के बीच सदैव प्रतिस्पर्धा रहती थी. समस्त लोकों में दानवों का आतंक फैला था तथा दैत्य गुरु शुक्राचार्य देवताओं को परेशान करने के लिए अपने दानव शिष्यों को उत्साहित और उत्तेजित करते थे.

आतंकित देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और करबद्ध याचना की "भगवन ! दया कीजिये, दिन-प्रतिदिन राक्षसों का आतंक बढ़ता जा रहा है, धर्म-ध्यान, कर्म-कांड, पूजा-पाठ और तपस्या में राक्षस अड़चन एवं विघ्न डाल रहे हैं, हम सब आपकी शरण में हैं”.

देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन (52 अंगुल के बौने का) रूप धारण किया और ब्राह्मण के वेष में राजा बलि के राज महल पहुँचे.

‘भिक्षाम-देहि’ ! राजा बलि ने वामन रूप में पधारे, ब्राह्मण वेषधारी भगवान विष्णु को प्रणाम करते हुए कहा “कहिए विप्र-देव ! मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ” ?

पौराणिक कथा - रक्षा-सूत्र का पुराणों में महत्व

वामन ने कहा “राजन ! पहले संकल्प लीजिये कि आप मेरी इच्छा को पूर्ण करेंगे, मेरी द्वारा मांगा गया दान करेंगे".

बलि बोले “आपके संशय से आश्चर्य चकित हूँ, यद्यपि अपने वचनों से मैं कभी विमुख नहीं हुआ तथापि आपको संदेह है, तो मैं संकल्प लेने को सहर्ष तैयार हूँ”.

राजमहल में उपस्थित दैत्य गुरु शुक्राचार्य समस्त वार्तालाप को सुन और देख रहे थे, वह समझ चुके थे कि ब्राह्मण वेष में उपस्थित वामन कोई साधारण याचक नहीं अपितु स्वयं भगवान विष्णु बलि को छलने आये है.

गुरु शुक्राचार्य ने बलि से कहा "राजन ! यह याचक कोई साधारण विप्र नहीं है, स्वयं विष्णु है. इन्हें पहचानने में भूल कर रहे हो, यह तुम्हें पराक्रम से नहीं अपितु छल से पराजित करना चाहते हैं. सावधान ! संकल्प कदापि नहीं लेना”.

गुरु की बात को सुनकर, दैत्यराज ने कहा “गुरुवर ! आपके कथन अनुसार यदि यह स्वयं भगवान विष्णु है, तब भी हमारे द्वार पर याचक बनकर आए हैं. आज तक बलि के यहाँ से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटा, फिर सृष्टि रचियता स्वयं कुछ मांगने आए है, तब उन्हें निराश कैसे करूँ ?"

बलि ने वामन से कहा “हे विप्र ! मैं संकल्प लेने को तत्पर हूँ.” शुक्राचार्य ने पुन: प्रयास किया कि बलि संकल्प न लें, किन्तु दानी बलि नहीं माने.

सेवकों से संकल्प लेने हेतु सामग्री (दूब, चावल, कुमकुम, पैसे, मौली तथा पानी की झारी) मंगाई. बलि गुरु शुक्राचार्य के आदेश एवं आशंका को पूरी तरह से अस्वीकार तथा अनदेखा कर चुके थे.

बलि को छले जाने के भय से व्याकुल दैत्य गुरु शुक्राचार्य लघुत्तर रूप में पानी की झारी की नली में बैठ गए.

बलि को संकल्प दिलाने के लिए वामन ने उसके बाएँ हाथ की हथेली पर समस्त सामग्री रखी और पानी की झारी से मन्त्रों के साथ हथेली पर जल छोड़ने को उद्धृत हुए, (सनातन धर्म में संकल्प इसी प्रक्रिया से संपन्न होता है) लेकिन जल का प्रवाह नहीं हुआ.

वामन देव ने सोचा शायद झारी की नली में कोई अवरोध है, झारी की नली के अवरोध को खत्म करने के उद्देश्य से एक तिनका नली में डाला.

तिनका अंदर बैठे शुक्राचार्य की आँख में लगा और वह एक आँख से अंधे हो गए. झारी से जलप्रवाह होने लगा, वामन ने संकल्पित रक्षा सूत्र बलि की कलाई पर इस मंत्र के साथ बांध दिया "येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:. तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल". ( सनातन धर्म में रक्षा सूत्र इस मंत्र के साथ कलाई पर बांधा जाता है.

धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूँ, अर्थात धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूँ.

इसके बाद ब्राह्मण रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना. इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है.

शास्त्रों में कहा गया है कि रक्षा सूत्र राजा के पुरोहित, यजमान के ब्राह्मण, भाई के बहन और पति के पत्नी द्वारा दाहिनी कलाई पर बांधा जाता है.) तत्पश्चात वामन बोले - “राजन ! मुझे तीन पग (पैर) भूमि दान में चाहिए.”

बलि ने कहा हे विप्र देव ! तीन पग भूमि के स्वामी आप हुए. बलि के इतना कहते ही भगवान विष्णु ने अपने विराट स्वरूप से अपना दाहिना पैर उठाकर पृथ्वी पर रखा, समस्त पृथ्वी उनके पैर के नीचे समा गयी, दूसरा पैर आकाश में रखा, सारा आकाश लोक नप गया.

तब वामन रूपी विष्णु जी बोले “राजन तीन पग भूमि मांगी थी, एक में पृथ्वी, दूसरे में आकाश नप गया, तीसरा पैर कहां रखूं ?" उन्होंने कहा – “आप अपना तीसरा पैर मेरे मस्तिष्क पर रखिए, मैंने भूमि का दान किया है स्वयं का नहीं.”

जैसे ही वामन ने बलि के मस्तिष्क पर पैर रखा वह सुतल लोक में चला गया और सुतल लोक भी वामन के पैर के नीचे समा गया. सृष्टि के रचियता विष्णु भाव-विभोर हो गए, वह जानते थे कि उन्होंने बलि के साथ छल किया है.

अपने स्वरूप में प्रकट होते हुए, बलि से बोले – “तुम महान दानी हो, मैंने तुम्हें छला हैं , तुम्हारा सर्वस्व अब मेरा हैं. मैं प्रसन्न होकर पाताल लोक पर राज्य करने का अधिकार आपको देता हूँ.

बलि ने विनम्रता से कहा- “हे दया निधि ! बस इतनी-सी दया कीजिए कि मेरे लिए निर्मित महल के जिस भी दरवाजे से मैं बाहर निकलूँ वहाँ आपके दर्शन हो." "रक्षिष्ये सर्वतोअहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम सदा सन्निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान"|| ( श्रीमद् भागवत महापुराण, अष्टम स्कन्ध, श्लोक 35 )

भगवान विष्णु ने बलि से कहा - तथास्तु !

संदेश - इस पौराणिक आख्यान का स्पष्ट उद्देश्य यह है कि सनातन धर्म में संकल्प और वचन-बद्धता का पालन सर्वोपरि है.शास्त्रों में गुरु की महत्ता को गोविंद से श्रेष्ठ बताया जाना अतिशयोक्ति नहीं है.

Written by:
प्रो. डॉ. सरोज व्यास

(लेखिका, इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र की समन्वयक एवं फेयरफील्ड प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थान, नई दिल्ली में निदेशक पद पर कार्यरत हैं. इसके अतिरिक्त एसोशिएशन ऑफ ह्युमन राइट्स, नई दिल्ली के महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्षा एवं राष्ट्रीय स्लम फाउंडेशन की भविष्योदय पत्रिका के प्रधान संपादक का संचालन कर रही हैं.)

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