श्रीमाधोपुर में अतिक्रमण और ट्रैफिक जाम का मुद्दा - श्रीमाधोपुर कस्बे के निवासियों को रोजाना कई समस्याओं से जूझना पड़ता है जिनमे पेयजल, अतिक्रमण तथा ट्रैफिक जाम, सरकारी महाविद्यालय का अभाव, विरासतों के प्रति उदासीनता, कचियागढ़ खेल स्टेडियम के प्रति उदासीनता, सीवरेज तथा सार्वजनिक पार्क की कमी, आदि प्रमुख रूप से है.

इन सभी मुद्दों के सम्बन्ध में हम श्रीमाधोपुर के प्रमुख मुद्दे नामक श्रंखला में बारी-बारी से चर्चा करेंगे. इस श्रंखला के पहले भाग में हम अतिक्रमण तथा ट्रैफिक जाम के मुद्दे के बारे में चर्चा करेंगे.

पेयजल की कमी श्रीमाधोपुर का सबसे बड़ा मुद्दा है. इसके बाद अगर किसी अन्य मुद्दे की बात की जाए तो वह अवैध अतिक्रमण का मुद्दा है. पूरा श्रीमाधोपुर कस्बा इस अतिक्रमण की चपेट में है. गलियों की तो बात ही क्या करें, कस्बे के मुख्य मार्गों पर भी अतिक्रमण की भरमार है.

जब सड़क पर ट्रैफिक होता है तब मुख्य मार्गों की चौड़ाई इतनी भी नहीं रह पाती है कि दो बसें एक दूसरे के सामने से आसानी से निकल जाए. कस्बे के मुख्य मार्गों पर अक्सर जाम लगा रहता है.

कुछ वर्षों पहले खंडेला की तरफ जाने वाली बसें रींगस बाजार से खंडेला बाजार होते हुए गौशाला की तरफ से होकर जाती थी. इस वजह से इन बाजारों में भी जाम लगा रहता था. फिर बाद में इन बाजारों में बसों का प्रवेश निषेध कर दिया गया परन्तु अभी भी इन बाजारों में अक्सर जाम लगा रहता है.

पहले, कस्बे के मुख्य बाजारों में बहुत सी दुकानों के सामने चबूतरे हुआ करते थे. धीरे-धीरे वो सब चबूतरे दुकानों के अन्दर समाहित हो गए.

श्रीमाधोपुर के आसपास के गाँवों तथा ढाणियों से हजारों लोग रोजाना, किसी न किसी कार्य से कस्बे में आते हैं. कस्बे में कहीं भी वाहनों की पार्किंग के लिए कोई व्यवस्था नहीं है.

इस वजह से इन लोगों को मजबूरन अपने वाहन, मुख्य सड़कों या गलियों में पार्क करने पड़ते हैं, जिसकी वजह से और अधिक जाम लग जाता है. प्रशासन को निजी वाहनों की पार्किंग के लिए कोई स्थान चयनित कर इस समस्या से निजात पाना होगा.

श्रीमाधोपुर में अतिक्रमण और ट्रैफिक जाम का मुद्दा

कस्बे में कोई टैक्सी स्टैंड भी नहीं होने से भी ट्रैफिक जाम रहता है. निजी टैक्सी गाड़ियाँ मुख्य मार्गों पर खड़ी रहती है जिनकी वजह से भी ट्रैफिक जाम रहता है. यह समस्या किसी टैक्सी स्टैंड के बनने से ही हल हो सकती है.

अगर गलियों की बात की जाए तो कस्बे की गलियों की चौड़ाई तो इतनी भी नहीं है कि एक कार तथा एक बाइक भी आमने सामने से निकल जाए. सबसे अधिक बुरा हाल तो फैंसी मार्केट की गलियों का है.

नागरिक परिषद् पुस्तकालय के बगल वाली गली में तो इतना अधिक अतिक्रमण है कि दुकानदारों ने पूरी की पूरी गलियों पर कब्जा कर रखा है.

इस गली में पुस्तकालय से सुरानी बाजार की तरफ चलने पर व्यापारियों ने पूरी की पूरी गली को साड़ियों तथा कपड़ों से ढककर पाट रखा है.

यहाँ से गुजरने पर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे किसी कटले में घूम रहे हैं. इस गली में से कार का निकलना तो दूर, दो दुपहिया वाहनों का भी निकलना मुश्किल है.

कस्बे की दो प्रमुख गलियों में सब्जी मंडी स्थित है. यहाँ सड़क पर ही सब्जी विक्रेता अपनी सब्जियाँ रखकर बेचते हैं. सब्जी विक्रेताओं तथा खरीददारों की भीड़ की वजह से इन दोनों गलियों में से पैदल गुजरना ही काफी मुश्किल होता है, वाहन से गुजरने की सोचना भी मूर्खता है.

इन दोनों गलियों को यातायात के लिए खोलकर सब्जी मंडी को कहीं दूसरी जगह पर स्थानांतरित करने से ही यह समस्या दूर हो सकती है.

ट्रैफिक जाम का एक प्रमुख कारण कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ते शोपिंग काम्प्लेक्स भी हैं. पिछले कुछ वर्षों में कस्बे में शौपिंग कॉम्प्लेक्सों की बाढ़ सी आ गई है.

दस-दस फिट की चौड़ाई वाली गलियों में भी तीन-तीन मंजिला व्यावसायिक काम्प्लेक्स शुरू हो गए हैं. इन कोम्प्लेक्सों में सुरक्षा तथा जन सुविधाओं का बहुत अभाव है. अवैध तथा बिना अनुमति के अधिकांश कोम्प्लेक्सों में तय मानकों के अनुसार पार्किंग की व्यवस्था नहीं है.

एक दो कोम्प्लेक्सों में औपचारिकतावश थोडी सी जगह पार्किंग के लिए छोड़ी गई है. इनमे आने वाले ग्राहकों को अपने वाहन गलियों में पार्क करने पड़ते हैं. इसके कारण भी सारे दिन यातायात व्यवस्था बाधित रहती है.

श्रीमाधोपुर कस्बे में बिना पार्किंग तथा अन्य सुविधाओं के दस-बारह फीट चौड़ी गलियों में तीन-तीन मंजिला शोपिंग काम्प्लेक्स बन जाना दाल में कुछ काला होना ही दर्शाता है. इन कॉम्प्लेक्सों में कितनों के पास नगरपालिका प्रशासन की लिखित अनुमति है? अगर है, तो प्रशासन ने इन्हें किन नियमों के तहत अनुमति दी है?

पूरे श्रीमाधोपुर में एक दो गलियों के अतिरिक्त, किसी भी गली की चौड़ाई इतनी नहीं है कि उसमे 108 एम्बुलेंस आसानी से घुस जाए. फायर ब्रिगेड की गाड़ी का गली में घुसना कल्पना से भी परे है.

गलियों की चौड़ाई कम से कम इतनी तो होनी ही चाहिए, कि जिनमे से फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ तो बड़े आराम से गुजर सके.

हादसे तथा दुर्घटनाएँ कभी भी बताकर नहीं होते हैं. अगर भविष्य में कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है तथा उस समय फायर ब्रिगेड अपना कार्य नहीं कर पाई तब उस नाकामी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

कस्बेवासी भी अतिक्रमण को बढ़ावा देकर अपने स्वास्थ्य तथा सुरक्षा के साथ समझौता कर रहे हैं. ऐसी गलियों में रहने से क्या फायदा होगा, जहाँ जरूरत के समय एम्बुलेंस तथा फायर ब्रिगेड भी नहीं पहुँच पाए.

नगरपालिका प्रशासन के साथ-साथ नगरवासी भी अपनी जिम्मेदारी को निभाने में पूर्णतया नाकाम रहे हैं. शायद इसी सोच की वजह से श्रीमाधोपुर कस्बा व्यापार तथा विकास के क्षेत्र में आसपास के अन्य कस्बों से पिछड़ता जा रहा है.

एक जमाने में श्रीमाधोपुर के बर्तन तथा कपडे का व्यापार आस पास के कस्बो में ही नहीं, बल्कि आस पास के जिलों में भी काफी प्रसिद्ध था. आज वो स्थिति बिलकुल नहीं है.

आज श्रीमाधोपुर व्यापार के साथ-साथ विकास में भी पिछड़ता जा रहा है. राजनितिक रूप से भी श्रीमाधोपुर तहसील तथा पंचायत समिति का दायरा कम होता जा रहा है.

श्रीमाधोपुर के व्यापारियों को इस बात को अच्छी तरह समझना होगा कि व्यापार के लिए चौड़ी सड़के जीवन रेखा का कार्य करती हैं. ट्रैफिक जाम मुक्त कस्बे का व्यापार ट्रैफिक जाम युक्त कस्बे के व्यापार से काफी अधिक होता है.

अगर ग्राहक को पार्किंग की सुविधा के साथ-साथ जाम मुक्त सड़क नहीं मिलेगी तो वह सिर्फ मजबूरी में ही खरीददारी करने के लिए आएगा. जिस दिन उसकी मजबूरी समाप्त हुई वह नहीं आएगा.

देशभर के व्यापारियों की यह शिकायत है कि अमेजन तथा फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों ने उनके व्यापार को चौपट कर दिया है. अब ये कंपनिया श्रीमाधोपुर जैसे कस्बों में भी अपने पैर पसारने लग गई है.

ये सोचने वाली बात है कि जब घर बैठे बाजार से कम रेट पर सामान घर पर आ जाएगा तो फिर कोई जाम में फँसने बाजार क्यों आएगा?

आज श्रीमाधोपुर कस्बे की हालत यह है कि यह कस्बा वो कस्बा प्रतीत ही नहीं होता जिसे 250 वर्ष पूर्व खुशाली राम बोहराजी ने बसाया था.

व्यापारियों के साथ-साथ आम जनता की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अवैध अतिक्रमण को बढ़ावा न देकर, सुगम यातायात में सहायक बनकर कस्बे की प्रगति में योगदान दें.

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