मिट्टी के रावण से 55 फीट के रावण तक का अनूठा सफर - दीपावली हिन्दुओं का सबसे प्रमुख त्यौहार है जिसे भारत में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में रहने वाले हिन्दू धर्मावलम्बी लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं.

इस त्यौहार की शुरुआत विजयदशमी से ही शुरू हो जाती है. दशहरे के दिन रघुकुल नंदन भगवान श्रीराम ने लंकेश रावण का वध किया था जिसके प्रतीक स्वरुप आज भी भारत में प्रतिवर्ष रावण, कुम्भकर्ण तथा मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाता है.

श्रीमाधोपुर कस्बे में भी दशहरे का त्यौहार मनाने की बहुत पुरानी परंपरा रही है. पुराने समय में यहाँ पर दशहरे का त्यौहार बड़े अनूठे ढंग से मनाया जाता था जिसमे भगवान नृसिंह के कुछ पुतलों की झाँकी के साथ मिट्टी के रावण को काम में लिया जाता था.

दशहरे के पर्व को व्यवस्थित ढंग से मनाने के लिए पंजाबी समाज आगे आया तथा इसके लिए आज से लगभग 50-60 वर्षों पूर्व दशहरा मेला कमेटी का गठन किया गया. बाद में इसे रजिस्टर करवाया गया तथा समय-समय पर विभिन्न पदाधिकारियों ने अन्य कार्यकर्ताओं की मदद से दशहरे के कार्यक्रम को सफलतापूर्वक अंजाम देना शुरू किया.

कमेटी में पंजाबी समाज के साथ-साथ श्रीमाधोपुर के अन्य गणमान्य व्यक्तियों का भी मनोनयन किया जाता है. वर्तमान में दशहरा मेला कमेटी के अध्यक्ष दयालदास सतीजा तथा सचिव नरेश पंजाबी सहित सभी अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता जिनमे गोविंदराम बतरा, किशोर नारंग, भगवानदास वधवा, नरेश सतीजा, संजय सतीजा, हरीश वधवा, हरीश कालड़ा, दौलत खुराना, पंकज खुराना, ओमप्रकाश खुराना व पुरषोतम गुलयानी आदि मिलकर दशहरे के कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं.

जैसे-जैसे समय बदला दशहरा मनाने की यह पुरानी परंपराओं तथा तौर तरीकों में भी बदलाव हुआ. रंगबिरंगी आतिशबाजी के साथ-साथ मिट्टी के रावण का स्थान बांस और कागज ने ले लिया.

पहले रावण दहन का कार्यक्रम पंचाली फाटक के आगे मैदान में होता था परन्तु समय बदलने के साथ-साथ आजकल अब यह कचियागढ़ स्टेडियम में होता है.

रावण दहन के कार्यक्रम को अत्यंत भव्य बनाने के लिए मेला कमेटी प्रतिवर्ष कुछ न कुछ नया करने के लिए प्रयत्नशील रहती है. दशहरे के दिन रावण दहन के समय कचियागढ़ स्टेडियम में हजारों की तादात में लोग इकट्ठे होते हैं. स्थानीय कस्बेवासियों के साथ-साथ निकटवर्ती ग्रामीण इलाकों के लोग भी इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

कचियागढ़ स्टेडियम में शाम के तीन चार बजे से मेला लगना शुरू हो जाता है जिसमे फास्टफूड, पानी पताशी आदि के साथ अन्य खाने पीने के ठेले रुपी दुकानें लगनी शुरू हो जाती है. घरेलू सामान के साथ-साथ अन्य वस्तुओं की दुकानें भी लगनी शुरू हो जाती है.

मिट्टी के रावण से 55 फीट के रावण तक का अनूठा सफर

मेले के साथ-साथ निकलने वाली शोभायात्रा में नगरपालिका, उपखंड कार्यालय, तहसील तथा पुलिस प्रशासन का भरपूर सहयोग रहता है. रोशनी तथा सफाई की व्यवस्था नगरपालिका द्वारा तथा कानून व्यवस्था को पुलिस प्रशासन द्वारा देखा जाता है. इनके साथ ड्रेस कोड में मौजूद मेला कमेटी के कार्यकर्ता भी व्यवस्था को सँभालने के लिए मुस्तैद रहते हैं.

मेला कमेटी द्वारा दशहरे के कार्यक्रम के लिए लगभग एक महीने पूर्व से तैयारियाँ शुरू कर दी जाती है. इन तैयारियों में रावण, कुम्भकर्ण तथा मेघनाथ के पुतले बनाने वाले कारीगरों का चयन, आतिशबाजी के सामान की व्यवस्था के साथ-साथ सम्पूर्ण कार्यक्रम की रूपरेखा बनाना प्रमुख है.

सम्पूर्ण पुतलों का निर्माण पंजाबी मंदिर में किया जाता है तथा दशहरे के दिन इन्हें दहन के लिए कचियागढ़ स्टेडियम में खड़ा किया जाता है.

दशहरे के दिन जय श्रीराम के नारों के साथ भगवान राम की शोभायात्रा, झाँकियों के रूप में शाम चार बजे पंजाबी मंदिर से रवाना होकर सुराणी बाजार, चौपड़ बाजार, रींगस बाजार व खटोडा बाजार होते हुए कचियागढ़ स्टेडियम में पहुँचती है.

दूसरी तरफ महावीर दल में बजरंगबली की सजावट होती है तथा फिर आतिशबाजी के साथ हनुमानजी की यात्रा भी कचियागढ़ स्टेडियम की तरफ रवाना होती है.

कचियागढ़ में पहुँचने के बाद में लगभग 6 से 7 बजे के मध्य रावण दहन का कार्यक्रम होता है. रावण दहन से पूर्व काफी देर तक रंगबिरंगी आतिशबाजी की जाती है.

पुतलों की लम्बाई समय के अनुसार बढती रहती है. इस वर्ष रावण के पुतले की लम्बाई 55 फीट तथा मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले की लम्बाई 30-30 फीट की थी. पुतलों को बड़ा आकर्षक बनाया जाता है.

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