विफल खेल-तंत्र को दुरुस्त करने की जरुरत - विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के विकास के लिए आवश्यक तत्वों के पैमाने भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन इस विकास-स्पर्धा में कुछ तत्व ऐसे भी हैं, जिन पर सभी देशों में आम सहमति भी है.

स्पोर्ट्स थ्रोन क्रिकेट एकेडमी बनाएगी अपना क्रिकेट स्टेडियम - असली भारत गाँवों में बसता है और अगर खेल की बात करें तो यह बात पूर्णतया सत्य है कि ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिभाओं की कहीं कोई कमी नहीं है, अगर कमी है तो सिर्फ उचित मार्गदर्शन के साथ-साथ उपलब्ध होने वाली सुविधाओं की।

एक पुरानी कहावत है कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं। जिनके दिलों में कुछ कर गुजरने की तमन्ना होती है वे बचपन में ही इस बात का आभास करा देते हैं कि भविष्य उनका होने वाला है। ऐसे ही प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व के धनी है श्रीमाधोपुर की अजीतगढ़ उपतहसील की ग्राम पंचायत सिहोड़ी की ढाणी नीमड़ी वाली के निवासी ओमप्रकाश मिठारवाल।

The Gentleman's game has not been so gentle since last 2-3 weeks as on the field controversies continue to grow and it also disrespected the belief of fans around the world. Honestly, the game who claims to have "Greatest Game" in the world tag is gradually questioning the Spirit of the Game too.

हाल ही में संपन्न हुई भारत-दक्षिण अफ्रीका टेस्ट सीरीज में भारतीय टीम के प्रदर्शन को भूतपूर्व महान खिलाड़ियों ने मिलाजुला बताया। गौरतलब है कि भारत ने टेस्ट सीरीज 2-1 के अंतर से गवाई, कहानी कुछ अलग भी हो सकती थी अगर बल्लेबाजों ने शुरुआती मैचों में मिले हुए मौके भुनाए होते।

कहते हैं कि पूत के पैर पालने में ही दिखने लग जाते हैं। कुछ ऐसा ही जीवन अर्जुन पुरस्कार विजेता अंतर्राष्ट्रीय बास्केटबॉल खिलाड़ी श्री राधेश्याम बिजारनियाँ का रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से बास्केटबॉल खेल में यह मुकाम हासिल किया।

किसी कार्य को अगर सही वक्त पर सही ढंग से किया जाए तो सफलता निश्चित रूप से प्राप्त होती है। बहुत सी प्रतिभाएँ उचित अवसरों तथा साधनों के अभाव में दम तोड़ देती हैं और अगर इन प्रतिभाओं में लड़के की जगह लड़की हो तो अक्सर उसकी प्रतिभा को घर के चूल्हे चौके तक ही सीमित कर दिया जाता है।

आज की पीढ़ी के सामने अगर गिल्ली डंडा नाम के खेल का जिक्र किया जाये तो उन्हें इस खेल का नाम सुनकर बहुत आश्चर्य होगा। शायद उन्होंने इस खेल का कभी नाम भी नहीं सुना होगा। नई पीढ़ी के सामने अब इस तरह के देशी खेलों का ना तो कोई महत्त्व हैं, ना ही उसकी कोई रुचि है और ना ही समय है।

बचपन से ही बुजुर्गो के मुख से एक कहावत बार बार सुना करते थे कि “पढ़ोगे, लिखोगे तो बनोंगे नवाब, खेलोगे, कूदोगे तो होओगे खराब”। ये कहावत सुनने के बाद ऐसा लगता था कि क्या वास्तव में खेलनें से हम खराब हो जायेंगे अर्थात हमारा करियर चौपट हो जायेगा? क्या खेलकूद में करियर नहीं बनाया जा सकता हैं?

आज का युग, सूचना प्रौधोगिकी का युग हैं जिसमे खेलकूद का एक प्रमुख स्थान हैं। खेलकूद खिलाड़ियों के साथ साथ इससे जुड़े दूसरे कई लोगों के लिए दुधारू गाय बन गया हैं। खेलकूद काफी हद तक एक व्यापार बन चुका हैं जिसमें इससे जुड़े अधिकतर व्यक्तियों का उद्धेश्य सिर्फ धन और नाम कमाना हैं।