एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका, यूरोप के देशों सहित दुनिया के अन्य देशों की नजर में भारत का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रूप से कोई महत्त्व नहीं समझा जाता था। इन देशों द्वारा भारत को केवल सपेरों एवं जादूगरों का देश ही समझा जाता था।

समय के साथ-साथ यह धारणा कछुए की रफ्तार से धीरे-धीरे बदल रही थी परन्तु इस धारणा को विश्व मंच पर बदलने तथा सम्पूर्ण विश्व में भारत की एक अलग पहचान बनाने का श्रेय अगर किसी व्यक्ति को जाता है तो वे हैं स्वामी विवेकानंद।

स्वामी विवेकानंद ने अंग्रेजों की गुलामी के दिनों में ही अपनी विद्वता से समस्त संसार वासियों के मन में भारत के प्रति आदर तथा सम्मान की भावना पैदा की। उन्होंने 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण के जरिए लोगों को भारत के आध्यात्मिक दर्शन के बारे में बताया तथा उनके सामने अपने प्राचीन ग्रंथो की व्याख्या इस प्रकार से प्रस्तुत की जिसे सुनकर सभी आश्चर्यचकित हो उठे थे। उन्होंने विदेश में भारत को उस रूप में प्रस्तुत किया जिसके बारे में सम्पूर्ण विश्व अनजान था।

स्वामीजी का व्याख्यान सुनकर अमेरिकी लोग उनके आगे नतमस्तक से हो गए थे। इसका पूर्वानुभास उसी समय हो गया था जब उन्होंने भाषण की शुरुआत “अमेरिका के बहनो और भाइयो” संबोधन के साथ की थी तथा इस बात पर बहुत देर तक तालियाँ बजती रही थी। स्वामीजी के इसी भाषण ने उनके साथ-साथ भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। उस समय अमेरिका में शायद ही ऐसा कोई समाचार पत्र रहा होगा जिसने स्वामीजी की तस्वीर तथा उनका परिचय प्रकाशित नहीं किया हो।

स्वामीजी द्वारा विश्व में भारत का नाम रोशन करने के पीछे निसंदेह उनकी प्रखर बुद्धि तथा उनके ज्ञान का स्थान सर्वोपरि है परन्तु नरेन्द्र को स्वामी विवेकानंद बनाने में एक ऐसी शख्सियत का योगदान भी रहा है जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इस महान शख्सियत का नाम राजा अजीत सिंह था जो तत्कालीन खेतड़ी रियासत के राजा थे। इनका जीवन स्वामीजी के जीवन से बहुत हद तक जुड़ा रहा है।

खेतड़ी नरेश अजीत सिंह का जन्म 16 अक्टूबर 1861 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित अलसीसर नामक स्थान पर हुआ। तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो इनकी तथा स्वामीजी की आयु में केवल मात्र दो वर्षों का अंतर था अर्थात राजा अजीत सिंह, स्वामीजी से आयु में करीब दो वर्ष बड़े थे।

अजीत सिंह के पिता का नाम ठाकुर छत्तू सिंह था। इन्हें खेतड़ी के तत्कालीन राजा फतेह सिंह ने गोद लिया था तथा जब ठाकुर छत्तू सिंह का देहांत हुआ तब 1870 ईसवी में अजीत सिंह खेतड़ी की राजगद्दी पर आसीन हुए। वर्ष 1876 में इनका विवाह रानी चंपावतजी साहिबा के साथ हुआ जिनसे इनके एक पुत्र और दो पुत्रियाँ पैदा हुई।

स्वामीजी की सफलता में राजा अजीत सिंह का नींव के पत्थर की तरह योगदान रहा है तथा इन्होने कभी भी कंगूरा बनने की चेष्टा नहीं की। अजीत सिंह जब स्वामीजी के संपर्क में आए तो वे उनकी विद्वता से अत्यंत प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए। स्वामीजी महान सिद्ध तथा विद्वान पुरुष थे। राजा अजीत सिंह ने उनके ज्ञान, कौशल, तीक्ष्ण बुद्धिमता, उच्च चरित्र और निष्कलंक तथा परोपकारी जीवन को देखकर ही उनका शिष्य बनना तय किया था।

धीरे-धीरे यह शिष्यता, मित्रता में परिवर्तित होती चली गई तथा एक समय ऐसा भी आया कि जब अजीत सिंह स्वामीजी के प्रिय शिष्य होने के साथ-साथ सबसे करीबी मित्र भी बन चुके थे। एक बार स्वामीजी ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि राजा अजीत सिंह उनके सबसे प्रिय मित्र और शिष्य थे।

स्वामी विवेकानंद ने अपने सम्पूर्ण जीवन में तीन बार खेतड़ी की यात्रा की। स्वामीजी सबसे पहले 1891 में, फिर उसके बाद 1893 में विश्व धर्म सम्मेलन में जाने से पूर्व तथा अंतिम बार 1897 में खेतड़ी की यात्रा पर आए। राजा अजीत सिंह बहुत बड़े दानवीर थे।

जब स्वामीजी विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका प्रस्थान कर रहे थे तब अजीत सिंह ने उनकी अमेरिका यात्रा तथा प्रवास का सम्पूर्ण खर्च उठाने का निश्चय किया। इस कार्य हेतु उन्होंने स्वामीजी को सादर खेतड़ी आने का निमंत्रण दिया तथा स्वामीजी के लिए संपूर्ण खर्च का प्रबंध कर उन्हें बंबई तक पहुँचाकर जहाज द्वारा अमेरिका रवाना करवाया।

जब स्वामीजी ने अपने व्याख्यान द्वारा अमेरिका में भारत का नाम रोशन किया तब सबसे ज्यादा प्रसन्नता राजा अजीत सिंह को हुई। इस प्रसन्नता को व्यक्त करने के लिए सम्पूर्ण खेतड़ी नगर में घी के दीपक जलाकर दीपावली मनाई गई। जब स्वामीजी के पिता का देहांत हुआ तब उनके परिवार को अत्यंत गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था।

ऐसे कठिन समय में अजीत सिंह ने उनके परिवार की बहुत आर्थिक मदद की। इस स्थिति में राजा अजीत सिंह हर माह उनके परिवार को 100 रुपए भेजा करते थे परन्तु उन्होंने स्वयं कभी भी इसका जिक्र तक नहीं किया।

गुलामी के उस युग में कई राजा महाराजा अपनी प्रजा पर बहुत जुल्म ढाते थे वहीं अजीत सिंह अपनी प्रजा को पुत्रवत प्रेम करते थे। राजा के प्रति इसी असीम श्रद्धा भाव की वजह से आज भी खेतड़ी निवासी अपने इस प्रजापालक राजा का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लेते हैं।

स्वामी विवेकानंद का राजस्थान से अत्यंत करीबी रिश्ता रहा है जिसकी प्रमुख वजह खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के साथ उनके मधुर सम्बन्ध थे। एक बार स्वामीजी जब खेतड़ी आए थे तब उन्होंने राजा अजीत सिंह के साथ घोड़ों पर सवार होकर जीण माता के दर्शन भी किए थे।

स्वामी जी का संन्यास से पूर्व नाम नरेंद्रनाथ दत्त था तथा वे अपने गुरु के स्वर्गवास के पश्चात संन्यासी बनकर सम्पूर्ण भारत भ्रमण पर निकल गए थे। वे जहाँ भी जाते थे तो वहाँ अपना परिचय विविदिषानंद नाम से दिया करते थे। भ्रमण करते हुए जब वे खेतड़ी के राजा अजीत सिंह से मिले तो उन्होंने ही स्वामीजी को विविदिषानंद की जगह विवेकानंद नाम दिया।

स्वामीजी को यह नाम अत्यंत पसंद आया तथा भविष्य में यही नाम उनकी उनकी विश्वव्यापी पहचान बन गया। स्वामीजी को साफा बांधना भी राजा अजीत सिंह ने ही सिखाया था जो कि उनकी तस्वीरों में साफ-साफ दृष्टिगोचर होता है।

कहते हैं कि भगवान अच्छे लोगों को जल्दी अपने पास बुला लेते हैं शायद इसी वजह से 18 जनवरी 1901 को उत्तरप्रदेश के सिकंदरा में राजा अजीत सिंह का देहांत हो गया। अपने प्रिय शिष्य की मृत्यु से स्वामीजी को भी गहरा आघात लगा और अगले ही वर्ष 4 जुलाई 1902 को वे भी इस दुनिया को त्यागकर स्वर्गालीन हो गए।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्वामीजी की सफलताओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कुछ योगदान राजा अजीत सिंह का भी रहा है परन्तु यह योगदान पूर्णतया निस्वार्थ था। जब-जब भी स्वामीजी की जीवन गाथा का जिक्र होगा तब-तब राजा अजीत सिंह का नाम उनके साथ अवश्य आएगा।

स्वामी विवेकानंद की सफलता में राजा अजीत सिंह का योगदान Contribution of King Ajit Singh in the success of Swami Vivekanand