एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका, यूरोप के देशों सहित दुनिया के अन्य देशों की नजर में भारत का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रूप से कोई महत्त्व नहीं समझा जाता था। इन देशों द्वारा भारत को केवल सपेरों एवं जादूगरों का देश ही समझा जाता था।

रक्षाबंधन के त्यौहार का समाज में एक प्रमुख और विशेष स्थान है क्योंकि ये त्यौहार भाई बहन के अनूठे और पवित्र रिश्ते को एक पवित्र डोर के माध्यम से गहन मजबूती प्रदान करता है। भाई बहन का रिश्ता वैसे ही बहुत पवित्र और मजबूत होता है लेकिन इस त्यौहार के माध्यम से हम इस रिश्ते का वो रूप देखते हैं जो दैनिक जीवन में कम देखा जाता है।

स्वतन्त्रता सेनानियों का जीवन त्याग और बलिदान की वह प्रेरणा गाथा रहा है जो भावी पीढ़ी के लिए हमेशा प्रेरणा स्त्रोत रहेगा। श्रीमाधोपुर क्षेत्र की धरती का स्वतन्त्रता आन्दोलन में प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से अविस्मर्णीय योगदान रहा है जिसे न तो पिछली पीढ़ियाँ भुला पायी हैं तथा न ही आगामी पीढ़ियाँ भुला पाएँगी।

क्या आप जानते हैं कि पूरे देश में हर वर्ष 14 सितंबर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है? क्या आपके मन में कभी यह प्रश्न नहीं उठता है कि हमारे देश में ऐसी क्या जरूरत पड़ गई कि हमें हिंदी दिवस मनाना पड़ रहा है?

पंडित बंशीधर शर्मा का जन्म 1904 में आषाढ़ कृष्ण पक्ष एकादशी के दिन श्रीमाधोपुर के गोछल्डी में हुआ था। इनके पिताजी का नाम पंडित बद्रीनारायण तथा माताजी का नाम श्रीमती गोरा देवी था। इनके माता पिता दोनों बहुत सुसंस्कृत, धार्मिक विचारों वाले संस्कारी लोग थे। बंशीधर बाल्यकाल से ही बहुत प्रतिभाशाली थे तथा इन पर इनके माता पिता के उच्च आदर्शों तथा संस्कारों का अत्यधिक प्रभाव पड़ा जिसकी वजह से इनकी प्रतिभा निखरती चली गई।

श्री बालूराम सैनी का जन्म 12 जनवरी 1922 को श्रीमाधोपुर के पुष्पनगर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री भीखाराम सैनी था। इनकी शिक्षा मिडिल स्तर तक हुई थी। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही ये गांधीजी के विचारों से बहुत प्रभावित हुए तथा इन्होने बचपन से ही प्रजा मंडल तथा चरखा संघ के माध्यम से स्वंत्रतता आन्दोलन में भाग लेना शुरू कर दिया।

मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की कलक्टर स्वाति मीना नायक श्रीमाधोपुर तहसील के छोटे से गाँव बुरजा की ढाणी की रहने वाली हैं। वर्ष 2007 में इन्होंने साढ़े बाईस वर्ष की उम्र में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की परीक्षा को अपने प्रथम प्रयास में उत्तीर्ण कर 260 वीं रैंक प्राप्त की।

कोलकाता महानगर के निवासी तथा श्रीमाधोपुर के प्रवासी बंधु अपने पुरखों की जन्मस्थली से दूर रहकर भी इसकी चतुर्दिक प्रगति तथा विकास के सम्बन्ध में प्रयत्नशील रहे हैं। श्रीमाधोपुर की शैक्षणिक संस्थाओं में इन प्रवासी बंधुओं का बहुत योगदान रहा है।

आज हम जिस स्वतंत्र हवा में साँस ले रहे हैं, जो स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं, यह हमें बहुत संघर्ष तथा त्याग के पश्चात मिला है अन्यथा एक दौर ऐसा भी था जब ऐसा महसूस होता था कि हमारी साँसे भी हमारी किस्मत की तरह गुलाम होकर रह गई है। यह वह दौर था जब देश अंग्रेजों की गुलामी का दंश झेल रहा था। उस दौर में कुछ ऐसे लोगों ने जन्म लिया जिन्हें गुलामी की जिन्दगी न तो स्वयं को स्वीकार्य थी तथा न ही वो अपने राष्ट्र को गुलाम देखना चाहते थे।