श्रीमाधोपुर उपखंड क्षेत्र में स्थित मूंडरु कस्बा शेखावाटी अंचल का एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ का इतिहास अति प्राचीन होकर सीधा-सीधा महाभारतकालीन युग से जुड़ा हुआ है।

पौराणिक धर्मग्रंथों व साहित्यों में इसे धर्म नगरी यानि छोटी काशी के नाम से जाना जाता था जो इस कस्बे की प्राचीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इतिहासकारों के अनुसार महाभारतकालीन गौरव गाथाओं से जुड़े कस्बे को ठाकुर हरदयरामजी ने संवत 1616 में बसाया था।

राज्य राजमार्ग 37 पर बसे मूंडरू कस्बे में एक तरफ जहाँ आम्रवृक्षों की अनुपम छटा ने चहुँ ओर नैसर्गिक प्राकृतिक सौन्दर्य को बरकरार रखा है तो दूसरी तरफ इतिहास को अपने अन्दर समेटे हुए मंदिर व सुविख्यात एक पत्थर की पहाड़ी यहाँ पर स्थित है। कस्बे की बसावट के समय इस एक पत्थर की पहाड़ी के चारों तरफ नदी का प्रवाह रहता था जिसकी वजह से यह मुंदरी (अंगूठी) के समान दिखाई देती थी इस वजह से कस्बे को प्राचीन समय में मुंदरी नाम से जाना जाता था।

मूंडरु कस्बे के पूर्व दिशा में सीतारामजी का मंदिर, पश्चिम में डाबर बालाजी मंदिर, दक्षिण में कोलवा बालाजी मंदिर व उत्तर में डूंगरी बालाजी के प्राचीन मंदिर स्थित है तथा ये सभी मूंडरु कस्बे के सुरक्षा प्रहरी के रूप में प्रतीत होते हैं। कस्बे में बिहारीजी का मंदिर, नृसिंह मंदिर, जानकीनाथजी के मंदिर सहित कुल 51 मंदिर है इसीलिए मूंडरु कस्बे को छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है। संध्याकाल की आरती के समय जब यहाँ के मंदिरों के घंटे, झालर व शंखों की ध्वनि गुंजायमान होती है तो कस्बे का वातावरण पूर्णतया भक्तिमय हो जाता है और मन श्रद्धा से भर उठता है।

वैसे तो यहाँ अनेक मंदिर है परन्तु इनमे सबसे प्राचीन मंदिर कस्बे के बीचों-बीच स्थित श्याम बाबा का मंदिर है। इस मंदिर की स्थापना ठाकुर हरदयरामजी ने सवंत 1656 में करवाई थी। ऐसा माना जाता है कि महाभारत के दौरान बर्बरीक का मूंड (शीश) यहाँ की धरा पर विराजित किया गया था जिस कारण यहाँ बाबा श्याम के मूंड (शीश) की पूजा की जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक ठाकुर हरदयरामजी को एक स्वपन में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए जिसकी वजह से उन्हें भीम के पौत्र तथा घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक (बाबा श्याम) के मूंड (शीश) के इस धरा में दबे होने का आभास हुआ। ठाकुर हरदयरामजी ने उस स्थान की खुदाई करवाई तो उन्हें बर्बरीक (बाबा श्याम) का मूंड रूपी पत्थर मिला।

विद्वान पंडितो व संत महात्माओं के सानिध्य में ठाकुर साहब ने मूंड (शीश) की स्थापना करवाकर बाबा श्याम का मंदिर बनवाया। बाबा श्याम का मूंड (शीश) रूपी पत्थर की वजह से धीरे-धीरे इस कस्बे का नाम मुंदरी से मूंडरु में तब्दील हो गया। उस समय ठाकुर हरदयरामजी ने चौहान वंश के राजपूत परिवारों को सेवा-पूजा का दायित्व सौंपा। वर्तमान में श्याम मन्दिर विकास समिति की देखरेख में स्वामी परिवार इस मंदिर में सेवा-पूजा का कार्य करता है।

कहा जाता है कि कालांतर में भौगौलिक परिवर्तनों के कारण बाबा श्याम का मन्दिर धरती के गर्भ में समा गया। साठ के दशक में मूसलाधार वर्षा के कारण सम्पूर्ण कस्बा जलमग्न हो गया तथा गाँव में एक जगह जमीन धँस जाने की वजह से गहरा गड्ढा हो गया तब उस गड्ढे में एक मन्दिरनुमा ढाँचा दिखाई देने लगा। ग्रामीणों ने जब उस जगह की खुदाई की तो वहाँ बाबा श्याम का प्राचीन मन्दिर सुरक्षित तथा अपने मूल रूप में निकल आया।

मंदिर की पीठ में स्थित पीपल के विशाल वृक्ष के आसपास की खुदाई के दौरान चूने-पत्थर की प्राचीन दीवारें, दरवाजे, कुंडनुमा बावड़ियाँ तथा मंदिर के गर्भगृह की चूने व पत्थर से निर्मित दीवारों की मोटाई व सीलन की गंध आज भी मंदिर के प्राचीन होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मन्दिर जीर्णोद्धार के दौरान जमीन के नीचे बाबा श्याम के प्राचीन मंदिर तथा गर्भगृह को यथावत रखा गया तथा तीसरी मंजिल पर बाबा श्याम की प्रतिमा स्थापित की गई।

मंदिर के शिखर का निर्माण व शीशा जड़ाई का भव्य कार्य जनसहयोग से पूर्ण कराया गया। यात्रियों के विश्राम हेतु कस्बे में दिल्ली वासी भक्तों और श्रीमूंडरू कृष्ण मुरारी सेवा समिति के सौजन्य से दो भव्य धर्मशालाओं का निर्माण करवाया जा रहा है।

मन्दिर विकास तथा रखरखाव के लिए वर्ष 2011-12 में श्रीश्याम विकास समिति के नाम से कमेठी का रजिस्ट्रेशन कराया गया। धीरे-धीरे राजस्थान के साथ-साथ कलकता, दिल्ली, मुंबई, बिहार, पंजाब व हरियाणा सहित देशभर के भक्तगण बाबा श्याम के दर्शनों के लिए यहाँ आने लगे। ऐसा कहा जाता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से अगर कोई यहाँ मन्नत मांगता है तो उसकी मन्नत अवश्य पूर्ण होती है तथा खाटू, रींगस व मूंडरु स्थित बाबा श्याम के तीनों मंदिरों के दर्शन करने पर ही यात्रा को पूर्ण माना जाता है।

कार्तिक मास की एकादशी को बाबा श्याम का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें कोलकाता व दिल्ली के फूलों से मंदिर की सजावट, अनुपम झाँकियाँ व भजनों की प्रस्तुतियाँ दी जाती है। देशभर से हजारों की संख्या में आए भक्तगण मंदिर में केक काटकर बाबा का जन्मोत्सव मानते हैं।

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की दौज तिथि को बाबा श्याम की रथ यात्रा निकाली जाती है जिसमें बाबा की आलौकिक झाँकी को सजाकर नगर-भ्रमण करवाया जाता है। जगह-जगह पुष्प वर्षा से रथ यात्रा का स्वागत होता है। विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमे देशभर के भक्तगण निशान चढ़ाने आते हैं।

श्रावण मास की ग्यारस को त्रिवेणी धाम से बाबा की निशान पदयात्रा निकाली जाती है जिसमे कोलकाता, दिल्ली, देवली, टोंक, मुंबई, बिहार सहित देशभर के हजारों भक्तगण शामिल होते हैं। इसके अलावा हर माह की ग्यारस तिथि को भजन संध्या होती है तथा पौषबड़ा, अन्नकूट व शरदपूर्णिमा पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगती है।

ग्रीष्मकाल में मंगला आरती सुबह 5:15 बजे, श्रृंगार आरती सुबह 7:15 बजे, राज (भोग) आरती दोपहर 12:15 बजे, ग्वाला आरती सांय 7:30 बजे तथा शयन आरती रात्री 10.00 बजे होती है। शीतकाल में मंगला आरती सुबह 6:15 बजे, श्रृंगार आरती सुबह 8:15 बजे, राज (भोग) आरती दोपहर 12:15 बजे, ग्वाला आरती सांय 5:30 बजे तथा शयन आरती रात्री 9:15 बजे होती है।

महाभारत काल के साथ मूंडरू के श्याम मंदिर का सम्बन्ध Relationship of Shyam temple Mundru with Mahabharata era