मूंडरू कस्बे में श्रद्धा और आस्था का प्रतीक भगवान नृसिंह लीला महोत्सव का आयोजन कस्बे की स्थापना के समय से ही चला आ रहा है। इतिहासकारों के अनुसार महाभारतकालीन गौरव गाथाओं से जुड़े इस ऐतिहासिक कस्बे को ठाकुर हरदयरामजी ने वर्ष 1616 में बसाया था।

इस प्रकार लगभग चार सौ वर्षों से प्रति वर्ष नृसिंहजी की लीला का आयोजन वैशाख सुदी जानकी नवमी या सीता नवमी को धूमधाम से किया जाता है। इस लीला की तैयारियाँ लगभग एक माह पूर्व से शुरू हो जाती है। कस्बे के कोल्डी चौक में होने वाले इस लीला महोत्सव में सर्व धर्म तथा सर्व समाज की पूर्णरूपेण भागीदारी होती है। लीला के आयोजन में मंदिर के पुजारी छितमक ब्राह्मण परिवार की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

स्थानीय निवासियों के अनुसार लीला में सर्व धर्म तथा सर्व समाज के लोग अपना सक्रिय सहयोग देकर आपसी भाईचारे की मिसाल कायम करते हैं। जहाँ देश में धर्म तथा जातिवाद का जहर फैल रहा है वहीँ इस कस्बे में इसके बिल्कुल विपरीत स्थिति है। लीला के समय धर्म, जाति तथा आपसी मनमुटाव का पूर्ण लोप होकर हर तरफ इंसानियत दिखाई देती है।

भाईचारे का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि भगवान नृसिंहजी की पालकी को मुस्लिम समाज द्वारा सजाया जाता है तथा भगवान परशुराम के अस्त्र शस्त्र भी इन्ही द्वारा निर्मित होते हैं। लीला में मशाल सैन समाज के लोग दिखाते हैं तथा लीला के दौरान काम आने वाला लकड़ी का सम्पूर्ण सामान जैसे घोड़े, पालकी समेत अन्य सभी सामान जांगिड समाज द्वारा बनाया जाता है।

लीला की पोशाकें दर्जी समाज द्वारा, कलाकारों को सजाने की जिम्मेदारी पारीक परिवार द्वारा तथा लीला महोत्सव की सभी व्यवस्थाएँ एवं सुरक्षा कार्य की जिम्मेदारी राजपूत समाज द्वारा कुशलता से निभाई जाती है। छितमका ब्राह्मण परिवार द्वारा सम्पूर्ण रात्रि लीला के मुख्य पात्रों की भूमिका अदा की जाती है। लीला में पात्रों द्वारा केवल मूक अभिनय ही किया जाता है।

नृसिंह मंदिर में भगवान नृसिंह के तीन चेहरे स्थित है जिनकी बड़ी अनूठी मान्यताएँ हैं। रथयात्रा के रूप में भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों की झाँकियाँ सजाकर निकाली जाती है। मंच पर चौबीस अवतारों का मंचन मुखौट धारण करके नृत्य शैली में किया जाता है।

इस दौरान सीता स्वयंवर, परशुरामजी का उग्र क्रोध, शंकासुर (शंखासुर) द्वारा वेदों का हरण करना, मत्स्य अवतार मंचन, हिरण्यकश्यप का वध, सागर मंथन के लिए कूर्म (कच्छप) अवतार का मंचन, कृष्णावतार मंचन के साथ-साथ कंस एवं कुबलयापीड़ हाथी के वध का प्रसंग प्रदर्शित किया जाता है। प्रातः भगवान नृसिंह का प्राकट्य कर भक्तों को आशीर्वाद प्रदान किया जाता है।

मूंडरू में 400 वर्षों से मनाया जाता है नृसिंह लीला महोत्सव Narsingh Leela Mahotsav is celebrated for 400 years in Mundru