धर्म और राजनीति दो अलग-अलग ध्रुव है जिनका स्वभाव एक दुसरे से बहुत अलग है तथा इनको पास-पास लाना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। आजादी के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में इस बात का खयाल रखा गया था कि इन दोनों में दूरी होनी चाहिए परन्तु वक्त बीतते-बीतते वह परिदृश्य काफी हद तक बदल गया और धर्म ने राजनीति में काफी हद तक जगह बना ली है। बहुत से धार्मिक मुद्दे राजनीतिक मुद्दों में तब्दील होने लग गए हैं।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ पर सभी धर्मों और पंथों का समान आदर और सम्मान है। धर्म के आधार पर राजनीति करना समाज के लिए बहुत चिंताजनक है क्योंकि इन मुद्दों से विभिन्न धर्मों के लोगों में आपसी वैमनस्यता बढ़ेगी तथा लोग अपने-अपने धर्म को महिमामंडित करने में लग जायेंगे। धार्मिक मुद्दे भावनात्मक मुद्दे होते हैं जो लोगों की परम्पराओं और मान्यताओं पर निर्भर होते हैं तथा लोग इनमे किसी भी तरह का हस्तक्षेप करना बर्दाश्त नहीं करते हैं।

धार्मिक मामलो में लोग दिमाग की नहीं सिर्फ और सिर्फ पुरानी मान्यताओं की ही मानते हैं तभी तो लाख कोशिशों के बाद भी हर धर्म से कुरीतियाँ और अंधविश्वास अभी तक समाप्त नहीं हो पाए हैं भले ही हम आधुनिक वैज्ञानिक युग में जी रहे हों। हम सभी मामलों में आधुनिक बनने का ढोंग कर लेते हैं परन्तु जहाँ पर धार्मिक मुद्दा होता है हम प्राचीन युग में लौट जाते हैं।

हम अपने फायदे के लिए उन सभी चीजों और सुविधाओं को आधुनिक बन कर स्वीकार कर लेते हैं जिनकी हमारे धर्म में मनाही हो। हम सभी विषयों में परिवर्तन को बड़ी आसानी के साथ यह कहकर स्वीकार कर लेते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है परन्तु जब भी कोई धर्म सम्बन्धी मुद्दा उठ जाता है तो हर पढ़ा लिखा आदमी भी नासमझ की तरह व्यवहार करने लग जाता है और किसी भी तरह के परिवर्तन को अस्वीकार कर देता है।

हमारे देश का इतिहास लाखों साल पुराना है तथा यहाँ बहुत से विदेशी लोग आये जिनमे से कुछ स्थायी रूप से यहीं बस गए तथा कुछ वापस चले गए। इन विदेशी लोगों का धर्म यहाँ के मूल निवासियों से अलग था तथा इनके अपने धर्म को मानने और मूल निवासियों के धार्मिक स्थलों को तोड़कर अपने धार्मिक स्थल बना लेने के कारण बहुत से धार्मिक विवाद आज भी है जिनमे से बहुत से मामले न्यायालय के अधीन विचाराधीन है।

विभिन्न धर्मों के लोग बहुत से धार्मिक स्थलों पर अपना-अपना अधिकार जताते रहते हैं तथा विभिन्न राजनीतिक दल समय-समय पर इन विवादों को हवा देकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकनें का प्रयास करते रहते हैं। जब कोई राजनीतिक दल किसी एक धर्म के लोगों के धार्मिक मुद्दों को अपना राजनीतिक मुद्दा बना लेता है तब दंगा फसाद होने ही संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।

राजनीतिक दल बहुत चालाकी से कार्य करते हैं। जब भी किसी तरह के कोई चुनाव होते हैं तब यकायक किसी न किसी रूप में धार्मिक मुद्दे को गर्माने लगते हैं और जैसे ही चुनाव समाप्त होते हैं ये मुद्दे पुनः ठन्डे बस्ते में चले जाते हैं और मुद्दे न्यायालय के अधीन होने ही दुहाई दे दी जाती है। जनता हर बार इस तरह की राजनीति का शिकार बन जाती है।

वैसे अब धर्म के आधार पर राजनीति करने और वोट मांगने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तथा अदालत को तय करना है की इस दिशा में कैसे आगे बढ़ा जाये। जब अदालत इस मसले को स्पष्ट कर देगी तब कई राजनीतिक दलों की रोटियाँ सिकनी बंद हो जाएगी।

धार्मिक मुद्दों का राजनीति में समावेश Inclusion of religious issues in politics