जयपुर के गढ़ गणेश मंदिर में होते हैं बाल्य रूप के दर्शन - यूँ तो भारत में गणेश जी के अनेक मंदिर स्थित है जिनकी भक्तों में काफी अधिक मान्यता है परन्तु इनमें से एक मंदिर ऐसा भी है जो इन सभी मंदिरों में अनूठा है. इसके अनूठे होने का कारण इसकी गणेश प्रतिमा का अद्वितीय रूप है.

सूर्य की गति के अनुसार घूमता है मालेश्वर शिवलिंग - जयपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर चौमू-अजीतगढ़ रोड पर सामोद कस्बे से लगभग 3-4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है महार कला गाँव. कई धरोहरों तथा घटनाओं को अपने अन्दर समेटे हुए यह गाँव ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है.

श्रीमाधोपुर की स्थापना का गवाह है यह शिव मंदिर - जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम के शासन काल में 1760-61 ईसवी के लगभग वर्तमान श्रीमाधोपुर के निकट हाँसापुर (वर्तमान में हाँसपुर) तथा फुसापुर (वर्तमान में पुष्पनगर) के सामंतो ने विद्रोह करके कर देना बंद कर दिया था।

कश्मीरी पंडित और शिवरात्रि का त्यौहार - कश्मीर में महाशिवरात्रि या शिवरात्रि को “हेरथ” के नाम से जाना जाता है. यह कश्मीरियों का सबसे बड़ा तथा प्रमुख त्यौहार है. यह त्यौहार फाल्गुन महीने के कृष्णपक्ष की द्वादशी से शुरू होकर पाँच छह दिनों तक बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है.

श्री खाटू श्याम जी दर्शन समय सारणी और आरती समय सारणी - खाटूश्यामजी मंदिर भारत का एक प्रमुख धार्मिक तथा दर्शनीय स्थल है। बाबा श्याम के दर्शनों के लिए यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। भक्तों की सुविधा के लिए यहाँ पर बाबा श्याम के दर्शन तथा आरती की समय सारणी दी जा रही है। अधिकृत जानकारी के लिए मंदिर प्रशासन से संपर्क करें।

श्री महावीर दल श्रीमाधोपुर कस्बे में दरवाजे वाले बालाजी के सामने स्थित है तथा इसे “अखाड़ा” के नाम से भी जाना जाता है। अपनी स्थापना के समय से ही यह मुख्यतया सामाजिक तथा धार्मिक कार्यों के साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बंधित गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है।

श्रीमाधोपुर उपखंड क्षेत्र में स्थित मूंडरु कस्बा शेखावाटी अंचल का एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ का इतिहास अति प्राचीन होकर सीधा-सीधा महाभारतकालीन युग से जुड़ा हुआ है।

श्रीमाधोपुर उपखंड क्षेत्र में स्थित मूंडरु कस्बा शेखावाटी अंचल का एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ का इतिहास अति प्राचीन होकर सीधा-सीधा महाभारतकालीन युग से जुड़ा हुआ है।

श्रीमाधोपुर का ऐतिहासिक दरवाजा तथा दरवाजे वाले बालाजी का मंदिर - श्रीमाधोपुर नगर की स्थापना 1761 ईस्वी में वैशाख शुक्ल तृतीय (अक्षय तृतीय) के दिन जयपुर राज दरबार के प्रधान दीवान बोहरा राजा श्री खुशाली राम जी ने ऐतिहासिक खेजड़ी के वृक्ष के नीचे की थी. यह खेजड़ी का वृक्ष आज भी चौपड़ बाजार में शिवालय के पीछे बालाजी के मंदिर के निकट स्थित है.

श्रीमाधोपुर कस्बा अनेक संतों की आश्रय स्थली रहा है जिनमे से कुछ संतों के प्रति क्षेत्रवासियों का लगाव तथा आस्था चरम पर रही है। ऐसे संतों में से एक प्रमुख संत हैं श्री आत्मानंद जी जिन्हें ब्रह्मचारी बाबा के नाम से भी जाना जाता है।

मूंडरू कस्बे में श्रद्धा और आस्था का प्रतीक भगवान नृसिंह लीला महोत्सव का आयोजन कस्बे की स्थापना के समय से ही चला आ रहा है। इतिहासकारों के अनुसार महाभारतकालीन गौरव गाथाओं से जुड़े इस ऐतिहासिक कस्बे को ठाकुर हरदयरामजी ने वर्ष 1616 में बसाया था।

गोपीनाथ जी का मंदिर अति प्राचीन है तथा इसकी स्थापना श्रीमाधोपुर कस्बे की स्थापना के समय ही हुई थी। इसकी नींव बोहरा राजा खुशाली राम जी द्वारा नगर की स्थापना के समय ही अक्षय तृतीय के दिन 1761 में रखी गई।

रघुनाथ जी का मंदिर श्रीमाधोपुर कस्बे के मध्य में राजपथ पर राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के सामने स्थित है। इस मंदिर का निर्माण गोविन्दगढ़ निवासी कानूनगो परिवार ने श्रीमाधोपुर की स्थापना के समय ही करवाया था। मंदिर निर्माण के पश्चात इसे सेवा पूजा कार्य के लिए जयपुर राजदरबार के पुजारियों को सौप दिया गया था।

नारायण दास जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1984 यानि 1927 ईस्वी को शाहपुरा तहसील के चिमनपुरा ग्राम में गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम श्री रामदयाल जी शर्मा तथा माता का नाम श्रीमती भूरी बाई था।

आत्मा और परमात्मा क्या है? परमात्मा कौन है? परमात्मा कहाँ निवास करते हैं? आत्मा का परमात्मा से क्या सम्बन्ध है? क्या आत्मा सिर्फ इंसान में ही होती है या ये फिर सृष्टी के हर जीव में मौजूद रहती है? क्या इंसान तथा अन्य जीवो की आत्मा में कोई समानता है या फिर ये भिन्न है?

धर्म और राजनीति दो अलग-अलग ध्रुव है जिनका स्वभाव एक दुसरे से बहुत अलग है तथा इनको पास-पास लाना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। आजादी के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में इस बात का खयाल रखा गया था कि इन दोनों में दूरी होनी चाहिए परन्तु वक्त बीतते-बीतते वह परिदृश्य काफी हद तक बदल गया और धर्म ने राजनीति में काफी हद तक जगह बना ली है। बहुत से धार्मिक मुद्दे राजनीतिक मुद्दों में तब्दील होने लग गए हैं।

जन्माष्टमी का त्यौहार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र के दिन धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी का त्यौहार श्री कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव है। इस दिन श्रीकृष्ण ने इस धरती पर जन्म लिया था तथा धरती को कंस के अत्याचारों से मुक्त करवाया था।