शारीरिक सुन्दरता भगवान की बक्शी हुई वो नैमत होती है जिस पर इंसान का कोई बस नहीं चलता है परन्तु इंसान अपने बुलंद इरादों तथा चट्टानी हौसलों से वह प्राप्त कर सकता है जो सुन्दरता पर काफी भारी पड़ जाता है। ऐसे ही बुलंद हौसलों की धनी है श्रीमाधोपुर निवासी सोनाली कुमावत।

नंगे पैर खेलने से शुरुआत करके बनी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी - सीकर जिले के श्रीमाधोपुर उपखण्ड का लगभग साढ़े तीन हजार की आबादी वाला छोटा सा गाँव चौमू पुरोहितान वॉलीबॉल के क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। पिछले दस वर्षों में यह गाँव महिला वॉलीबॉल खिलाडियों की खान बनकर उभरा है।

चिंता मनुष्य का एक तरह से जन्मजात गुण है जैसे बचपन में खिलौनों की चिंता, जवान होने पर पढ़ाई तथा नौकरी की चिंता तथा वृद्ध होने पर बुढ़ापे की चिंता। वैसे बुढ़ापे की चिंता तो जवानी से ही शुरू हो जाती है जब मनुष्य जवानी के साथ-साथ बुढ़ापे की भी चिंता में चिंतातुर होता रहता है।

किसी शायर ने कहा हैं कि “कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता”। इसी प्रकार से मानव का जीवन हैं जिसमे असीमित इच्छाएँ होती हैं और जिनका अंत नहीं होता हैं। एक के समाप्त होते ही दूसरी उसके मन मस्तिस्क में जगह बनानें लगती हैं तथा वह इच्छाओं का गुलाम बनता चला जाता हैं।

इंसान एक सामाजिक प्राणी है तथा बिना समाज के उसका अकेला रह पाना बहुत मुश्किल होता है। हम अपने आस पास इंसानों की भीड़ देखने के आदी हैं तथा खुद भी वक्त बेवक्त उस भीड़ का हिस्सा बने रहते हैं। हर इंसान के जीवन पर उसके आस पास के माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता है।

आशा और निराशा ऐसे शब्द है जिनका मतलब हर कोई अपने हिसाब से निकाल सकता है। इनका मानव जीवन के साथ बहुत गहरा सम्बन्ध होता है। हर आदमी के लिए इनका पैमाना अलग-अलग होता है। हर आदमी के साथ कुछ न कुछ आशाएँ तथा निराशाएँ जुडी रहती है।

आजकल एक दूसरे को देखकर हर किसी में इंटरप्रेन्योर बनने की चाह बढती जा रही है तथा अपनी इस चाह को पूरा करने के लिए वे इंटरप्रेन्योर बन तो जाते हैं परन्तु बिना मेहनत किये ही इसमें सफल भी होना चाहते हैं। बहुत से लोग इसे जिन्दगी से जोड़ कर देखते हैं तथा बाद में असफल होकर अपने आप को या फिर अपने भाग्य को कोसने लग जाते हैं।

इंसान अपनी जिन्दगी में सब कुछ पाने का दावा कर रहा है परन्तु वह अभी तक गुजरे हुए समय को पाने में या फिर समय की गति से छेड़छाड़ करने में सक्षम नहीं हो पाया है। इन्सान बहुत सी प्राकृतिक चीजों के साथ छेड़छाड़ करके उन्हें अपने हिसाब से बदलने के प्रयासों में लगा हुआ है जिनमे से कुछ में वह कुछ हद तक सफल भी हुआ है।

डर हर इंसान के मन में समाया हुआ है। इंसान चाहे चेतन अवस्था में हो या फिर अचेतन अवस्था में, उसे किसी न किसी बात का डर हमेशा सताता रहता है। मनुष्य का जीवन तरह-तरह के डर रुपी राक्षसों से घिरा हुआ है तथा ये राक्षस मनुष्य के मस्तिष्क में अपना स्थाई घर बना कर रहते हैं।

सफलता हर मनुष्य का चरम लक्ष्य है तथा सफलता को प्राप्त करने के लिए वह अपना सब कुछ दाव पर लगा देता है। मनुष्य अपनी इच्छित सफलताओं को साकार करने के लिए अपने दिन का चैन तथा रातों की नींद भी खों बैठता है। पूरी उम्र वह इसी उहापोह में ही गुजार देता है जिसकी वजह से वह अपने तथा अपने परिवार के लिए भी वक्त नहीं निकाल पाता है।

हर मनुष्य का जीवन के प्रति कुछ न कुछ दृष्टिकोण होता है क्योंकि हर मनुष्य में कभी न कभी वैराग्य से सम्बंधित विचार अवश्य पैदा होते है। जब संसार से मन उचटने लगता है तब कुछ समय के लिए ही सही, परन्तु मनुष्य अपने जीवन तथा उसके जीने के तरीकों के बारे में पुनः अवश्य विचार करता है।

जब मनुष्य प्रयास करने के पश्चात भी मनमाफिक सफलता नहीं पाता है तो फिर वह उसके लिए किसी न किसी को जिम्मेदार समझनें लग जाता है। अपनी असफलता का दोष किसी और पर डालने की कोशिश करते-करते वह भगवान को भी दोषी बताने लगता है। ऐसी परिस्थिति में वह कहने लगता है कि सफलता और असफलता ईश्वर पर निर्भर करती है।

कहते हैं कि जब तक दुनिया में बेवकूफ लोग मौजूद हैं तब तक समझदार लोग कभी भी भूखे नहीं मर सकते हैं। इस बात का तात्पर्य यह है कि मूर्ख लोगों के बीच समझदारों का काम बहुत आसान हो जाता है। अब यह कैसे तय होगा कि दुनिया में कौन मूर्ख है और कौन समझदार है? मूर्खों के कोई सींग तो होते नहीं है कि उन्हें झट से पहचान लिया जाए। वैसे भी आज के युग में जो चतुर और धूर्त नहीं है उसे अघोषित रूप से मूर्खों की श्रेणी में डाल दिया जाता है। वैसे भी समझदार की सबसे बड़ी पहचान एक ही रह गई है कि जो भी व्यक्ति सफल है वह समझदार है। कोई व्यक्ति कैसे सफल है उससे किसी को कोई लेना देना नहीं होता है।

कुछ लोग वास्तव में समझदार होते हैं परन्तु अधिकतर लोग सिर्फ समझदार होने का ढोंग ही करते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि समझदार लोग दो तरह के होते हैं एक तो वे जो समझदार जैसे दिखते हैं तथा दूसरे वे जो वास्तव में समझदार होते हैं। यहाँ हम यही प्रमुख बात समझने की कोशिश करेंगे कि इन समझदार दिखने वाले तथा वास्तव में समझदार लोगों के बीच मूल रूप से क्या अंतर होता है?

वास्तविक रूप से समझदार लोग कभी भी लकीर के फकीर नहीं होते हैं। ये लोग अपने रास्ते खुद बनाते हैं न कि किसी के दिखाए हुए रास्तों को ही अपनी नियति समझ लेते हैं। इन लोगों में नए-नए कार्य करने का जज्बा तथा जोखिम लेने की हिम्मत होती है।

आधुनिक युग में सफल व्यक्ति को ही जीने के काबिल समझा जाता है तथा असफल व्यक्ति के लिए यह समझा जाता है कि वह जीने के काबिल भी नहीं है। सफलता ही जीवन का पैमाना बन गया है तथा सफल व्यक्ति ही सम्मान तथा प्रतिष्ठा का हकदार समझा जाता है।

दुनिया का दस्तूर होता है कि वह चढ़ते सूरज को सलाम करती है फिर चाहे वह किसी भी क्षेत्र की बात हो। चढ़ते सूरज से मतलब सफल व्यक्ति से होता है। हर सफल व्यक्ति दुनिया के लिए एक उदहारण होता है। सफल व्यक्तियों का अनुपात असफल व्यक्तियों के मुकाबले में नगण्य होता है अर्थात बहुत कम लोग अपनी मनमाफिक सफलता प्राप्त कर पाते हैं।

जाने अनजाने में ही सही परन्तु हम सभी को जीवन में कभी न कभी आत्म विश्लेषण की जरूरत पड़ती रहती है। आत्म विश्लेषण करना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि यह हमें हमारी कमियों के बारे में बताता है। जब हमें हमारी कमियों के बारे में पता चल जाता है तब इन कमियों को दुरस्त करके इनको सुधारना बहुत आसान बन जाता है।

“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” जिसने भी ये कहा है बहुत गहरी बात कही है। जब तक मन हार नहीं मानता है तब तक इंसान में इच्छा शक्ति बनी रहती है या फिर यूँ कहें कि जब तक दृढ़ इच्छा शक्ति होती है इंसान में हौसला बना रहता है, जब तक हौसला बना रहता है तब तक इंसान किसी भी कार्य को करने में अपने आप को सक्षम समझता है।