कहते हैं प्रेम की ना तो कोई भाषा होती है तथा ना ही कोई बंधन होता है। भाषा तथा बंधन से मुक्त होने की वजह से प्रेम कभी भी, कहीं भी तथा किसी से भी हो सकता है। शायद यही एक वजह है कि प्रेम प्रदर्शन के लिए "वैलेन्टाइन डे" आज एक अन्तराष्ट्रीय त्यौहार यानि ग्लोबल फेस्टिवल बन चुका है।

नब्बे के दशक से शुरू हुआ वैलेंटाइन डे का प्रचलन बढ़ते-बढ़ते आज उस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ पर इसका मनाना अति आवश्यक सा हो गया है। वह पीढ़ी जो नब्बे के दशक में पैदा हुई तथा जिसने बचपन से ही वैलेंटाइन डे के बारे में काफी कुछ सुना और देखा है उसके लिए तो यह एक पर्व की भाँती होता है।

सेवानिवृति एक सम्मानसूचक शब्द प्रतीत होता है तथा सेवानिवृत व्यक्ति के लिए मन में यकायक ही कुछ सम्मान उमड़ पड़ता है। यह शब्द किसी को खुश करता है और किसी को डराता है। कुछ लोग सेवानिवृति को कार्यो से मुक्ति और आराम का समय समझते हैं तो कुछ लोग इसे इंसान की दूसरी बेरोजगारी से परिभाषित करते हैं।

क्या धर्म और विलासिता का आपस में कोई सम्बन्ध है? क्या विलासी जीवन धर्म के पथ से भटकने लग जाता है? क्या धार्मिक व्यक्ति को विलास में नहीं डूबना चाहिए? ये कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर प्राप्त करना बहुत आवश्यक है। विलासिता उस स्थिति का नाम होता है जो एक धार्मिक व्यक्ति को धर्म के पथ से भटकाकर अधर्म के पथ पर ले जा सकती है।

“छोटू” नाम से हम सभी परिचित हैं तथा आये दिन हम भी जाने अनजानें में इस नाम को पुकारते हैं। यह शब्द अधिकतर छोटे कद वाले लोगों को पुकारने में प्रयोग किया जाता हैं फिर चाहे वो उम्र में भले ही पुकारनें वाले से दोगुनीं उम्र के ही क्यों न हो।

अगर हमारा यह विश्वास है कि इस धरती को हमें बचाने की कोई जरुरत नहीं है कोई और इसे बचा लेगा तो हम बहुत बड़े खतरे को आमंत्रित कर रहे हैं। अगर हर इंसान यही सोचकर अपनी जिम्मेदारियों से भाग जायेगा तो इस धरती पर जिम्मेदारी कौन निभाएगा? क्या हम पशु पक्षियों पर ये जिम्मेदारी डाल दे? क्या इस धरती को पशु पक्षियों ने नुकसान पहुँचाया है?

सुख और दुःख जीवन के दो पहलू होते हैं जो कभी भी साथ साथ नहीं रहते हैं। ये एक दूसरे के पूरक होते हैं और जब एक रहता हैं तो दूसरा नहीं रहता हैं। इन्हें धूप छाँव, सिक्के के दो पहलुओं की संज्ञा दी जाती हैं। हर इंसान के जीवन में सुख और दुःख दोनों का क्रम चलता रहता हैं।

सुन्दरता हर किसी के जीवन की परमावश्यक ख्वाहिश रही है तथा येन केन प्रकारेण हर व्यक्ति सुन्दर दिखना चाहता है। सुन्दरता के इसी महत्व को देखते हुए दुनिया भर में सौन्दर्य की अनेकों परिभाषाएँ गढ़ी गई है। हर कोई सुन्दरता को अपने पास समेट लेना चाहता है फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष।

सृष्टि रचयिता ने जीवन चक्र चलाने के लिए हर जीव को दो रूपों में विभक्त किया है। पहला रूप नर तथा दूसरा रूप मादा का होता है। नर तथा मादा एक दूसरे के पूरक होते हैं अर्थात एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं। ईश्वर ने जीवन चक्र को सरलता से चलाने के लिए नर तथा मादा के बीच नैसर्गिक स्नेह की भावना उत्पन्न कर रखी है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह विभिन्न परिस्थितियों में रहकर अपना जीवन यापन करता है। उसके जीवन को कभी खुशी और कभी गम घेरे रहते हैं। कई मर्तबा परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं होती है और मनुष्य एक ऐसा रूप धारण कर लेता है जो किसी को प्रिय नहीं होता, वह रूप क्रोध का होता है।

“ना जाने कैसे, पल में बदल जाते हैं, ये दुनिया के बदलते रिश्ते”, बचपन में जब रेडियो पर रफी साहब का ये गाना बजता था तब ना तो इसका मतलब पता था और ना ही पता करने की कोई जिज्ञासा होती थी, महज दूसरे गानों की तरह इसे भी सुनकर भूल जाया करते थे।

आज का इंसान दोहरी दुनिया में जीवन व्यतीत कर रहा है जिसमे पहली वास्तविक दुनिया (Real World) है तथा दूसरी आभासी दुनिया (Virtual World) है। वास्तविक दुनिया वह दुनिया होती है जिसमे हम भौतिक रूप से निवास करते हैं तथा आभासी दुनिया वह होती है जिसमे हमें वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है।

इस दुनिया में इतनी अधिक गरीबी है कि बहुत से लोगों के लिए दो जून की रोटी मिलना ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य होता है। करोड़ों लोगों को भरपेट खाना नहीं मिल पाता है तथा उन्हें अधिकतर एक वक्त कुछ खाकर ही अपना तथा अपने परिवार को पालना पड़ता है।

कहने को तो बलात्कार भी आम शब्दों की तरह महज एक शब्द है परन्तु इसका अर्थ बहुत भयावह तथा घिनौना है। यह वह यातना है जो औरत को बिना किसी जुर्म के दे दी जाती है। यह वो दाग है जो एक बार लग जाने के पश्चात मृत्यु पर्यन्त नहीं धुलते हैं।

आँखे ईश्वर की बनाई हुई वो रचना है जिसके द्वारा हर जीव जंतु इस खूबसूरत दुनिया के दर्शन करता है। शरीर आँखों का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा बिना आँखों के जिन्दगी में अँधेरा छा जाता है। आँखें नहीं होने पर जीवन में हर तरफ घने काले भयाक्रांत कर देने वाले अन्धकार के अलावा कुछ नहीं रहता है।

ईश्वर ने मानव के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों में नर तथा मादा को लगभग समान रूप से ताकतवर बनाया है। धरती पर केवल इंसान ही एक ऐसी प्रजाति है जिसमे नर के मुकाबले मादा की ताकत प्राकृतिक रूप से कम होती है। जब से पृथ्वी का उद्गम हुआ है तथा सभ्यता अस्तित्व में आई है तभी से हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है।

कहने को तो बलात्कार भी आम शब्दों की तरह ही एक शब्द है परन्तु इसका मतलब बहुत भयावह तथा घिनौना है। यह वह यातना है जो औरत को बिना किसी जुर्म के दे दी जाती है। यह वो दाग है जो एक बार लग जाने के पश्चात मृत्यु पर्यन्त साफ नहीं होता है।

ब्रह्माण्ड के रचयिता ने कभी भी ये कल्पना नहीं की होगी कि उसके द्वारा सृजित जीवन कभी इतना उद्वेलित हो जायेगा कि उसे इन परिस्थितियोँ से बाहर निकलने के लिए भावनात्मक तथा औषधीय सहारा ढूँढना पड़ेंगा। सृजित जीवन में सिर्फ इंसान ही उद्वेलित जीवन व्यतीत कर रहा है।