हिंदी भाषा को अशुद्ध करने में समाचार पत्रों की भूमिका - मीडिया लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका अदा करता है तथा इसे लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ भी कहा जाता है। मीडिया में मुख्यतया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया का प्रमुख स्थान होता है।

प्रिंट मीडिया की महत्ता इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से कई मायनों में अधिक होती है परन्तु जनमानस तक इसकी पहुँच इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले में बहुत कम होती है।

चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पहुँच के मामले में प्रिंट मीडिया को परास्त कर दिया हो परन्तु फिर भी प्रिंट मीडिया का समाज में अपना एक अहम रोल तथा भूमिका है। प्रिंट मीडिया का प्रमुख उदाहरण समाचार पत्र है। समाचार पत्रों को हम समाज तथा सरकार का आईना कह सकते हैं। समाज तथा सरकार के बारे में विस्तृत जानकारी तथा उनमे घटने वाले घटनाक्रमों की जानकारी हमें समाचार पत्रों से मिल जाती है।

सूर्योदय के साथ जब समाचार पत्र घर में आता है तो घर के सभी सदस्यों में उसे पढ़ने की एक होड़ सी लग जाया करती है। सभी को समाचार पत्र का इन्तजार रहता है। अगर किसी दिन समाचार पत्र नहीं आता है तो हमारी सुबह बड़ी नीरस तथा सूचना विहीन हो जाती है।

समाचार पत्रों से हमें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के अतिरिक्त बहुत सी ज्ञानवर्धक पठनीय तथा रोचक जानकारियाँ भी मिलती है। यह उन विद्यार्थियों के लिए तो ज्ञान का खजाना साबित हो सकता है जिन्हें अपने सामान्य ज्ञान में सुधार करना हो तथा उसका वर्धन करना हो।

परन्तु अब धीरे-धीरे समाचार पत्रों की भाषा शैली बदलती जा रही है तथा उनमे अशुद्धियों की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। यहाँ पर मुख्यतया हिंदी भाषी अखबारों की बात हो रही है। सभी हिंदी भाषी अखबार भाषाई अशुद्धियों से भरे पड़े रहते हैं।

प्रतिवर्ष हिंदी दिवस आता है

लगभग सभी अखबारों ने शब्दों के ऊपर से “चन्द्रबिन्दु” का प्रयोग बंद सा कर दिया है। हर जगह “चन्द्रबिन्दु” की जगह “अं” की मात्रा का ही प्रयोग हो रहा है, जो कि सरासर अशुद्ध है। सभी अखबारों में आपको चाँद की जगह चांद, बाँट की जगह बांट, पहुँच की जगह पहुंच, पाँच की जगह पांच, जाएँ की जगह जाएं, हँसना की जगह हंसना, मुँह की जगह मुंह, बूँद की जगह बूंद, गाँव की जगह गांव, दवाइयाँ की जगह दवाइयां, नदियाँ की जगह नदियां, मचाएँगे की जगह मचाएंगे तथा चाँदनी की जगह चांदनी ही मिलता है।

इस प्रकार की सभी अशुद्धियाँ बड़ी खरतनाक है क्योंकि ये हमारी भाषा को अशुद्ध करती है। समाचार पत्रों के पाठकों में बच्चे, जवान, बुजुर्ग, व्यापारी, विद्यार्थी आदि सभी लोग शामिल होते हैं। समाचार पत्र को नियमित रूप से पढ़ा जाता है। अगर नियमित रूप से कोई अशुद्धि हमारे सामने आती है तो फिर धीरे-धीरे हम उसे सही मान लेते हैं। बच्चों तथा विद्यार्थियों के लिए ये अशुद्धियाँ बहुत नुकसानदायक साबित हो सकती हैं क्योंकि वे इन्ही अशुद्धियों के साथ अपनी परीक्षा में शामिल होंगे।

इन अशुद्धियों की वजह से विद्यार्थियों का भविष्य तो खराब हो ही सकता है तथा साथ ही साथ हमारी राष्ट्रभाषा की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है। आखिर क्या वजह है कि सभी समाचार पत्र इन अशुद्धियों की तरफ अपना ध्यान नहीं दे रहे हैं? समाचार पत्रों में निरंतर अशुद्धियों की मात्रा क्यों बढती जा रही है?

हमारे विचार में इसके बहुत से कारण है। सबसे पहला कारण तो यह है कि समाचार पत्रों के बहुत से पत्रकार पूरी तरह से इस क्षेत्र की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता का धारण किये हुए नहीं होते हैं यानि कि कोई भी आदमी किसी भी शैक्षणिक योग्यता के साथ पत्रकार बन जाता है।

इस प्रकार की संभावनाएँ कस्बों तथा गाँवों में अधिक पाई जाती है जहाँ जर्नलिज्म में बैचलर तथा मास्टर डिग्री धारी लोग पत्रकार के रूप में बहुत कम होते हैं तथा ऐसे लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय होते हैं जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता है। ये लोग अन्य काम धंधों से जुड़े होते हैं तथा पत्रकारिता इनके लिए प्राथमिकता नहीं होती है। जब किसी क्षेत्र में विशेषज्ञ की जगह अल्पज्ञ काम करने लग जाते हैं तो उनके द्वारा न चाहते हुए भी उस क्षेत्र का बंटाधार हो जाता है।

सोशल मीडिया के सिपाही

दूसरा कारण संभवतः समाचार पत्रों द्वारा प्रत्येक समाचार की भाषा पर उचित ध्यान नहीं देना है। जो खबर इन्हें मिलती है संभवतः उसकी ढंग से एडिटिंग नहीं हो पाती है या फिर हो सकता है कि एडिटिंग करने वाले लोग भी भाषाई विशेषज्ञ नहीं हो।

कुछ हद तक आमजन तथा इन्टरनेट ने भी भाषा की अशुद्धियों को बढ़ाया है जिसका प्रमुख कारण ऑनलाइन वर्ड कनवर्टर सॉफ्टवेयर (जैसे गूगल इनपुट) का प्रयोग करना तथा हिंदी व्याकरण के प्रति हमारा अल्पज्ञान भी है। ऐसे सॉफ्टवेयर्स शब्दों को किसी भी भाषा से किसी भी भाषा में बदल देते हैं।

आज लगभग हर व्यक्ति हिंदी लिखने के लिए ऐसे ही सॉफ्टवेयर्स का इस्तेमाल करता है परन्तु या तो अतिशीघ्रता या फिर अल्पज्ञान की वजह से गलत शब्दों का चयन कर भाषा में अशुद्धियों की भरमार पैदा कर रहा है जिससे नुकसान हमारी भाषा को हो रहा है।

हमारा समाचार पत्रों से यही निवेदन है कि वे अपनी भाषाई अशुद्धियों की तरफ ध्यान देकर उन्हें दुरुस्त करें क्योंकि समाचार पत्र समाज का आईना होने के साथ-साथ भाषा के प्रचार का भी प्रमुख माध्यम होते हैं। लोगों के मानसिक विकास तथा परिपक्वता में इनका बहुत बड़ा योगदान होता है। समाचार पत्रों की भाषा से सभी लोग प्रभावित होते हैं क्योंकि ये जनमानस के मन मष्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

हिंदी भाषा को अशुद्ध करने में समाचार पत्रों की भूमिका

हिंदी भाषा को अशुद्ध करने में समाचार पत्रों की भूमिका Role of newspapers in making erroneous Hindi language

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