केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार के मध्य आपसी सम्बन्ध इस बात पर निर्भर करते हैं कि दोनों जगह सरकार किस पार्टी की है। अगर दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार होती है तो दोनों सरकारें आपसी समन्वय तथा सहयोग के साथ कार्य करती रहती हैं परन्तु अगर दोनों जगह अलग-अलग पार्टियों की सरकार होती है तब अक्सर आपस में खींचतान बनी रहती है।

अमूमन खींचतान की स्थिति वहाँ ज्यादा होती है जहाँ राज्य पूर्ण राज्य नहीं होता है। केंद्र शाषित राज्य के नाम पर केंद्र सरकार को लोकतंत्र का मखौल उड़ने के अधिक अवसर होते हैं। इसी खींचतान का एक प्रमुख उदाहरण दिल्ली सरकार तथा केंद्र सरकार के मध्य अधिकारों को लेकर होती आ रही रस्साकशी है।

दिल्ली में जबसे केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है तभी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे राज्य सरकार को समुचित रूप से कार्य नहीं करने दे रहे हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से दिल्ली की सरकार चलाना चाह रहे हैं।

दरअसल दिल्ली भारत की राजधानी होने के साथ-साथ केंद्र शाषित प्रदेश भी है जहाँ कानून और व्यवस्था, जमीन तथा पुलिस पर सीधा-सीधा नियंत्रण केंद्र सरकार के अधीन है। इन तीनों क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य सभी तरह के अधिकार राज्य सरकार के अंतर्गत आने चाहिए परन्तु केंद्र सरकार ने सभी क्षेत्रों में अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए इन क्षेत्रों में भी उप राज्यपाल के जरिये अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया जिसके परिणामस्वरूप राज्य सरकार अपने अधिकारों के लिए हाई कोर्ट में मात खाने के बाद सुप्रीम कोर्ट चली गई।

सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की सविधान पीठ ने मामले की लम्बी सुनवाई कर दोनों सरकारों के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन कर दिया। अब कानून और व्यवस्था, जमीन तथा पुलिस के अतिरिक्त अन्य किसी क्षेत्र पर केंद्र सरकार का नियंत्रण नहीं रहेगा तथा उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद के फैसले को मानने के बाध्य होंगे।

यह फैसला केजरीवाल सरकार के लिए एक जीत के रूप में देखा जा रहा है तथा राज्य सरकार के उस दावे पर मोहर लगाता है कि केंद्र सरकार उपराज्यपाल के जरिये रोजमर्रा के कार्यों में दखल दे रही है। अब यह उम्मीद है कि केंद्र सरकार इस ऐतिहासिक फैसले से सबक लेकर चुनी हुई राज्य सरकार को स्वतंत्र रूप से कार्य करने देगी।

लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का सर्वाधिक महत्त्व होता है परन्तु स्थिति तब भयावह बन जाती है जब चुनी हुई सरकार के अधिकारों का हनन मनोनीत व्यक्ति द्वारा करवाया जाए। सोचने वाली बात है कि अगर दिल्ली में उपराज्यपाल ही प्रमुख थे तो फिर आज तक विधानसभा के चुनाव करवाकर जनता को बेवकूफ क्यों बनाया जाता रहा? जनता के खून पसीने की कमाई में से करोड़ों रूपए खर्च करके चुनाव करवाया जाए तथा चुना हुआ मुख्यमंत्री बिना अधिकारों के रहे, ऐसे चुनावों का फायदा क्या है?

यह गौर करने वाली बात है कि दिल्ली में इस प्रकार की परेशानी आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद ही क्यों पैदा हुई? दरअसल अरविन्द केजरीवाल की छवि एक ईमानदार राजनेता की है जो अपने अधिकारों के लिए परिणाम की परवाह ना कर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करते। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली सरकार अपने किए हुए वादे एक के बाद एक पूरे करते जा रही है। दिल्ली शायद पहला राज्य है जहाँ पानी तथा बिजली की दरें काफी कम है, शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हो रही है।

दिल्ली सरकार द्वारा किए हुए कार्यों की वजह से शायद केंद्र सरकार इतनी अधिक डर गई थी कि वह दिल्ली सरकार के सभी कार्यों में बाधा पहुँचाने लग गई थी। परन्तु सत्य की हमेशा जीत होती है और अंततः हुआ भी यही। अब केजरीवाल सरकार के पास पूरा मौका रहेगा कि वे बचे हुए समय में उन सभी कार्यों को संपन्न करके दिखाएँ तथा अपने उस दावे को सच साबित करें कि उन्हें केंद्र सरकार कार्य नहीं करने दे रही थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने की केजरीवाल की राह आसान Supreme court verdict makes Kejriwal way easy