जबसे हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने एक टीवी इंटरव्यू में पकौड़े के राष्ट्रीय महत्त्व के बारे में चर्चा कर इसे बेरोजगारी दूर करने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया तब से पकौड़े ने भी देश में चाय जितनी ही ख्याति अर्जित कर ली है।

माननीय प्रधान मंत्री ने जब पकौड़े तलने को बेरोजगारी खत्म करने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया तब इस देश को एक नई दिशा मिली और सभी का ध्यान इस दिशा में आकृष्ट हुआ। कितने अफसोस की बात है कि माननीय प्रधानमंत्री से पहले आज तक किसी भी अर्थशास्त्री का ध्यान रोजगार के इतने बड़े विकल्प पर गया ही नहीं।

माननीय प्रधानमन्त्री की इस बात को बहुत असरदार तरीके से लिया गया है क्योंकि वे स्वयं जमीन से उठे हुए इंसान है। शायद माननीय प्रधानमन्त्री को पकौड़ों के महत्त्व के बारे में तभी पता चल गया था जब इन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी से वर्ष 1983 में राजनीति विज्ञान विषय में 62.3 प्रतिशत में एमए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात भी चाय बेचने को अपना पेशा स्वीकार किया। दरअसल चाय और पकौड़े का बहुत नजदीकी रिश्ता होता है। एक दूसरे के बिना दोनों अधूरे होते हैं यानि दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं।

पकौड़ों का असली महत्त्व एक चाय के व्यवसाय से जुड़ा हुआ व्यापारी ही समझ सकता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह होता है कि जहाँ-जहाँ पकौड़े का ठेला होता है वहाँ उसके पास या उसके आसपास चाय की दुकान भी होती है। जब पकौड़े का व्यापार बढेगा तब चाय का व्यापार भी उसी अनुपात में अपने आप बढ़ जायेगा।

हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने पकौड़े तलने को बेरोजगारी दूर करने का एक बेहतर विकल्प बताया है। यह एक सुलभ व्यापार हो सकता है तथा चाय की तरह इसके ग्राहक भी बहुत होते हैं। सर्दी तथा बारिश के मौसम में बेरोजगारी की समस्या सबसे कम होगी क्योंकि पकौड़ों की बिक्री इन्ही दो मौसम में सर्वाधिक होती है।

अब हमारे प्रधानमन्त्री की बात के समर्थन में उन्ही की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी आ गए हैं। उन्होंने राज्य सभा में दिए अपने पहले भाषण में पकौड़े बनाने को रोजगार के प्रमुख विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसकी जोरदार वकालत की है। उनके हिसाब से इससे बेरोजगारी को दूर करने में बहुत मदद मिलेगी तथा देश में रोजगार बढेगा।

प्रधानमंत्री तथा उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा पकौड़े तलने की इतनी अधिक वकालत को देखते हुए ऐसा लगता है कि हो सकता है कि आने वाले समय में देश को एक नया मंत्रालय तथा मंत्री भी मिले। इस नए मंत्रालय का नाम “पकौड़ा रोजगार मंत्रालय” तथा मंत्री को “पकौड़ा रोजगार मंत्री” कहा जा सकता है।

यह मंत्रालय “प्रधानमंत्री पकौड़ा रोजगार योजना” के नाम से नई योजना भी शुरू कर सकता है जिसे स्वच्छ भारत के थीम सोंग की तरह “पकौड़े तलने का इरादा कर लिया हमने” के रूप में भी पेश किया जा सकता है। बैंकों द्वारा “प्रधानमंत्री पकौड़ा रोजगार योजना” के तहत बहुत कम ब्याज पर ऋण बाँटा जा सकता है, इससे एक तीर से दो निशाने साधे जाएँगे, एक तो बेरोजगारी कम होगी तथा दूसरे बैंकों की आर्थिक स्थिति सुधरने में मदद मिलेगी।

विद्यार्थियों को स्कूली जीवन से ही पकौड़े तलने की तालीम दी जा सकती है तथा इसे शिक्षा में अनिवार्य रूप से शामिल भी किया जा सकता है। कॉलेज एजुकेशन को और अधिक तर्कसंगत बनाकर पकौड़े से सम्बंधित नए-नए कोर्स शुरू किए जा सकते हैं जैसे “बैचलर इन पकौड़ा”, “मास्टर इन पकौड़ा”, “बैचलर इन पकौड़ा टेक्नोलॉजी”, “मास्टर इन पकौड़ा टेक्नोलॉजी”, “बैचलर इन पकौड़ा साइंस”, “मास्टर इन पकौड़ा साइंस”, “बीएड इन पकौड़ा” आदि।

पकौड़े तलने में लोग डॉक्टरेट की उपाधि भी ले पाएँगे तथा पकौड़ों से सम्बंधित नई-नई रिसर्च भी सामने आएँगी जिससे पकौड़ों की किस्मों तथा गुणवत्ता दोनों में इजाफा होगा। इससे रोजगार बढ़ने के साथ-साथ पकौड़ों के स्वाद में भी वृद्धि होगी। कुल मिलाकर देश पकौड़ा-पकौड़ा हो जाएगा। जिधर देखो पकौड़े बनाने वाले तथा पकौड़े खाने वाले दोनों ही दिखेंगे।

पकौड़े के बढ़ते हुए राष्ट्रीय महत्त्व की वजह से आने वाले समय में हो सकता है कि सरकार पकौड़े तलने को उद्योग का दर्जा भी देना पड़े। आज भी अगर देखा जाए तो देश में पकौड़े तलने वालों की कुल संख्या करोड़ों में होगी तथा जब सरकार इसे रोजगार के साथ जोड़ देगी तो इनकी संख्या आज के मुकाबले कई गुना बढ़ जाएगी।

इसका सबसे अधिक फायदा सरकार को होगा क्योंकि इस उद्योग से देश की राष्ट्रीय आय तथा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भी बहुत अधिक वृद्धि हो जाएगी तथा देश खुशहाली की तरफ बढेगा। जिस प्रकार एक जमाने में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उसी प्रकार हो सकता है कि आने वाले समय में दुनिया में भारत की पहचान “पकौड़ों का देश” के रूप में बने।

जल्द ही शुरू हो सकती है प्रधानमंत्री पकौड़ा रोजगार योजना Prime Minister Pokoda employment scheme may start soon