क्या हमने पहले भी इस तरह के दृश्य देखे हैं कि जब किसी मुख्यमंत्री को उसके ही राज्य में पुलिस ने किसी से मिलने के लिए हिरासत में ले लिया हो? मुख्यमंत्री किसी पीड़ित परिवार से मिलने जा रहें हो और उन्हें उस पीड़ित परिवार से मिलने नहीं दिया गया हो?

आपने शायद पहले इस तरह की परिस्थितियाँ नहीं देखी होगी जहाँ किसी चुनी हुई सरकार के चुने हुए मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के साथ कभी इस तरह का सलूक उसके राज्य की पुलिस ने किया हो।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को दिल्ली पुलिस ने उस समय रोका गया जब वे एक पूर्व सैनिक के पीड़ित परिवार से मिलने की कोशिश कर रहे थे। ज्ञातव्य है कि दिल्ली में एक पूर्व सैनिक ने वन रैंक वन पेंशन के मुद्दे पर आत्महत्या कर ली थी और मुख्यमंत्री उसके परिवार से मिलने की कोशिश कर रहे थे। क्या एक मुख्यमंत्री अपने राज्य में किसी पीड़ित परिवार से नहीं मिल सकता है? क्या दिल्ली के अलावा भारत के किसी अन्य राज्य में इस तरह की घटना घट सकती है जहाँ पुलिस अपने ही राज्य के मुख्यमंत्री को हिरासत में ले सके?

अगर नहीं तो फिर ऐसी क्या वजह हुई कि दिल्ली पुलिस इस तरह के कृत्य पर उतर आई। दरअसल इसकी मूल वजह यह है कि दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के अधीन नहीं है बल्कि वह केंद्र सरकार के अधीन है। दिल्ली की सरकार के अधीन नहीं होने के कारण पुलिस पर दिल्ली सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। हमारे देश में पुलिस सिर्फ उसी सरकार के आदेशो का पालन करती है जिसके वो सीधे नियंत्रण में रहती है। दिल्ली पुलिस अपने आप को सिर्फ केंद्र सरकार के प्रति जवाबदेह समझती।

दिल्ली पुलिस की मुख्यमंती के प्रति कोई जवाबदारी नहीं होने से वह मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन भी नहीं करती है। इन पारिस्थितियों की वजह से दिल्ली का मुख्यमंत्री लगभग सभी कार्यो में अपने आप को शक्तिविहीन महसूस करता है क्योंकि उसके और केंद्र सरकार के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों की लड़ाई चलती रहती है।

यह एक राजनीतिक रस्साकशी है जिसमे जनता पिस रही है। जनता समझ नहीं पा रही है कि दिल्ली में किस सरकार का शासन है, दिल्ली को राज्य सरकार चला रही है या फिर केंद्र सरकार। अधिकार दोनों सरकारें चाहती है परन्तु जिम्मेदारियाँ कोई नहीं चाहता है। अभी तक तो सरकार के अधिकारों का भी मुकदमा शीर्ष अदालत में लंबित चल रहा है।

जब से आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में आई है तभी से अधिकारों की लड़ाई अपने चरम पर है। राज्य सरकार जो भी निर्णय लेती है उसमे अधिकारों की लड़ाई सामने आ जाती है। केंद्र सरकार लेफ्टिनेंट गवर्नर के माध्यम से उन निर्णयों को या तो अधिकारों की दुहाई देकर रद्द कर देती है या फिर उन्हें ठन्डे बस्ते में डाल देती है।

अगर दिल्ली में एक शक्तिविहीन मुख्यमंत्री को ही बैठना था तो जनता का इतने अभूतपूर्व बहुमत के साथ किसी पार्टी को विजयी करवाना व्यर्थ ही चला गया। ऐतिहासिक बहुमत के साथ चुनी हुई सरकार के पास अगर कोई अधिकार ही नहीं हैं तो फिर चुनाव का ही क्या औचित्य रह जाता है। चुनाव में जनता के खून पसीने की कमाई को क्यों व्यर्थ गवांया जा रहा है?

इससे तो अच्छा यही होगा कि या तो दिल्ली पूरी तरह केंद्र शाषित प्रदेश बनकर केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहे या फिर एक पूर्ण राज्य बनकर राज्य सरकार के नियंत्रण में रहे। जब तक इन दोनों कार्यो में से कोई एक कार्य नहीं होगा तब तक दिल्ली की जनता इन दोनों सरकारों के बीच ऐसे ही पिसती रहेगी।

बिना अधिकारों वाला मुख्यमंत्री Powerless Chief Minister