वर्तमान समय में स्वामी विवेकानंद के मूल्यों की आवश्यकता - कल भारतीय महान दार्शनिक एवं चिंतक स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी 1863 - 4 जुलाई 1902) की 146वीं जन्मतिथि है। स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों, विशेषतया अमेरिका एवं यूरोप में भारतीय दर्शन (वेदान्त एवं योग) के परिचय एवं इसके प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ही विश्व को भारतीय अध्यात्मवाद एवं इसके सूत्रों से अवगत कराया।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक स्वामी विवेकानंद ने विश्व पटल पर हिंदू धर्म एवं इसके दर्शन के विस्तार का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया। सनातन वैदिक दर्शन एवं इसके महत्वपूर्ण सूत्रों जैसे कर्म-योग एवं राज-योग के संदर्भ में उनके विचार आज भी प्रासंगिक है।

उन्होंने कर्म-योग में कर्म और इसके प्रभाव, कर्तव्य, स्वावलंबन और स्वतंत्रता के बारे में अपने विचार रखे, वहीं राज-योग में यम, नियम, आसन और प्राणायाम को भी बेहतर ढंग से परिभाषित किया।

सही मायनों में जब विश्व में पुनर्जागरण का दौर चल रहा था, उसी समय स्वामी जी ने भी हिंदू धर्म की सुदृढ़ आधारशिला रख दी थी। सितंबर 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित हुए विश्व धर्म संसद में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।

इसी कार्यक्रम में उन्होंने अपना ऐतिहासिक भाषण भी प्रस्तुत किया था। विश्व भर से आए बुद्धिजीवियों और श्रोताओं के समक्ष उन्होंने सनातन धर्म की सतत एवं समग्र व्याख्या की थी।

उन्होंने धर्म संसद में दो बार 11 सितंबर 1893 और 27 सितंबर 1893 को अपने विचार रखे। कार्यक्रम में उन्होंने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान की शुरुआत सुप्रसिद्ध कथन "अमेरिका के भाइयों और बहनों" से की थी। यह सुनते ही पूरा कक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था।

यह पहला अवसर था जब उन्होंने विश्व के सबसे प्राचीन धर्म का परिचय विश्व से करवाया। स्वामी विवेकानंद के अनुसार यह हिंदू धर्म ही है जिसने संसार को सहिष्णुता एवं सार्वभौमिक स्वीकार्यता का अध्याय पढ़ाया।

स्वामी विवेकानंद के आलोचक मानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के दर्शन का व्यापक झुकाव हिंदू धर्म की तरफ ही है लेकिन यह भी सत्य है कि उन्हें हिंदू ही नहीं बल्कि पूर्वी एवं पश्चिमी संस्कृति, मानव दर्शन एवं अन्य सभी धर्मों का भी विस्तृत ज्ञान था।

उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन किया और इन्हें स्वीकार भी किया। उन्होंने कर्म-योग में 'बुद्ध के धम्म' का भी उल्लेख किया है। इन सब से स्पष्ट होता है कि स्वामी विवेकानंद सहिष्णु थे।

स्वामी विवेकानंद को युवाओं के प्रेरणास्रोत के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भारतीय युवाओं को वेद-दर्शन का अध्ययन करने एवं विश्व में इसे प्रसारित करने का कार्य दिया था।

उन्होंने भारतीय अध्यात्म एवं सनातन दर्शन के अतिरिक्त तत्कालीन भारतीय समाज में फैली कुरीतियों का घोर विरोध किया था।

वर्तमान समय में हमें स्वामी विवेकानंद के प्रासंगिक दर्शन मूल्यों के पुनर्जागरण की आवश्यकता है। इस कथन का तात्पर्य किसी भी प्रकार की दार्शनिक-क्रांति से नहीं है अपितु इसका अर्थ स्वामी जी के विचारों को समाज में प्रसारित करने का है।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई। महज 39 वर्ष की अल्पायु में यह महान संत भारतवर्ष से विदा हुए लेकिन अपने पीछे ऐसे प्रासंगिक विचार छोड़ कर चले गए जो आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरणा देते रहेंगे।

"उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये"

लेखक:
केशव शर्मा
बीए ऑनर्स (राजनीति विज्ञान)

वर्तमान समय में स्वामी विवेकानंद के मूल्यों की आवश्यकता Need of values of Swami Vivekananda in present time