सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के सम्बन्ध में एक बहुत ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो आरक्षण सम्बन्धी भावी विवादों को सुलझाने में बहुत सहायक होगा। माननीय शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि अगर किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीद्वार ने अपने वर्ग में उम्र, योग्यता तथा अनुभव आदि में छूट ले ली है तो उसे सामान्य वर्ग में आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

मतलब कि अगर किसी परीक्षार्थी ने अपने वर्ग में आरक्षण का लाभ ले लिया तो उसे सामान्य वर्ग में नौकरी नहीं मिलेगी।

अब तक यह होता आया है कि आरक्षित वर्ग के उम्मीद्वार सामान्य वर्ग के उम्मीद्वारों से अधिक अंक प्राप्त करने के पश्चात सामान्य वर्ग में शामिल कर लिए जाते थे। अब यह होगा कि जिस उम्मीद्वार ने जिस वर्ग से आवेदन किया है वह सिर्फ उसी वर्ग में नौकरी पा सकेगा जैसे उदाहरण के लिए अगर किसी ने ओबीसी वर्ग से आवेदन किया है तो वह सिर्फ ओबीसी वर्ग में ही नौकरी पा सकेगा चाहे उसके सामान्य वर्ग के विद्यार्थी से अधिक अंक क्यों न हो।

हम सामान्य वर्ग की तुलना रेल के सामान्य डिब्बे से कर सकते हैं जिसमे कोई भी यात्री सफर कर सकता है। इस सामान्य डिब्बे में किसी को सीट मिलती है तथा कई लोग खड़े-खड़े यात्रा भी करते हैं। सामान्य डिब्बे में किसी भी तरह का आरक्षण नहीं होता है तथा किसी भी धर्म तथा जाति के लोग इसमें यात्रा का सकते हैं। एससी, एसटी तथा ओबीसी एवं अन्य आरक्षित वर्गों को हम रेल के अन्य आरक्षित डिब्बों के समान समझ सकते हैं तथा जिस प्रकार सामान्य डिब्बे का यात्री आरक्षित डिब्बे में सवारी नहीं कर सकता ठीक उसी प्रकार आरक्षित वर्ग का उम्मीद्वार भी सामान्य वर्ग में नहीं आ सकता है।

इस फैसले के वक्त न्यायाधीश ने बताया कि 1 जुलाई 1999 के डीओपीटी के नियमों में भी यह साफ किया हुआ था कि एससी, एसटी तथा ओबीसी के उन उम्मीद्वारों को जो अपनी मेरिट पर चयनित होकर आए हैं उन्हें सामान्य वर्ग में समायोजित नहीं किया जायेगा। जब इन आरक्षित वर्ग के उम्मीद्वारों के लिए छूट के मानकों जैसे उम्र सीमा, अनुभव, शैक्षणिक योग्यता, फीस में कटौती, लिखित परीक्षा के लिए अधिक अवसर दिए जाते हैं तब इन्हें आरक्षित रिक्त पदों के लिए ही विचारित किया जाएगा। ये अनारक्षित पदों के लिए योग्य होंगे।

अब बड़ा प्रश्न यह है कि जब 1999 में ही ये नियम बन चुका था तो अब तक इसकी पालना क्यों नहीं की जा रही थी? क्यों सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के हितों पर इस तरह का कुठाराघात किया जा रहा था? दरअसल सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों में कुंठा तथा आक्रोश ने जन्म लेना शुरू कर दिया था तथा उनके दिमाग में यह धारणा बनने लग गई थी कि भारत में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के लिए सरकारी सेवाओं में कोई जगह नहीं बची है।

अब वह पुराना वक्त नहीं रहा है कि जब आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों से अंकों में पिछड़े रहते थे। अब आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी अपने वर्ग के साथ-साथ सामान्य वर्ग में भी आने लगे हैं जिससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के लिए अवसर कम हो गए हैं तथा सामान्य वर्ग की बहुत सी जातियों को आरक्षण की जरूरत महसूस होने लग गई है।

बहुत से लोग सामान्य वर्ग को केवल सामान्य जातियों के लिए बता कर भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं जबकी सच्चाई यह नहीं है। हमें यह बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि सामान्य वर्ग अन्य आरक्षित वर्गों की तरह किसी जाति विशेष के लिए नहीं बना है बल्कि यह वह वर्ग है जिसमे आरक्षित तथा अनारक्षित दोनों वर्गों के लोग आवेदन कर सकते हैं अर्थात सामान्य वर्ग उन सभी जातियों के लिए है जो इसमें आवेदन करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले से सामान्य वर्ग को बहुत राहत प्रदान की है तथा इस फैसले से भारत के नागरिकों का न्यायपालिका पर विश्वास ओर अधिक मजबूत होगा बशर्ते इस फैसले को लेकर वोट बैंक के लिए राजनीतिक चालें न चली जाएँ।

आरक्षण के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय Historic decision by Supreme Court regarding reservation