अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म के शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य कर दिया है। फैसले में कहा गया है कि जब राष्ट्रगान बज रह होगा तब परदे पर तिरंगा दिखाया जायेगा तथा वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों को इसके सम्मान में खड़ा होना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह इस बाबत मीडिया में उचित प्रचार कर जनता को जागरूक करें। निश्चित रूप से शीर्ष अदालत ने यह फैसला नेकनीयत के साथ जनमानस में देशभक्ति की भावना को बढ़ाने के इरादे से दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एक जनहित याचिका का निपटारा करते वक्त दिया। दरअसल यह विवाद करण जौहर द्वारा निर्मित फिल्म कभी खुशी कभी गम के प्रदर्शन के वक्त से चला आ रहा है क्योंकि इस फिल्म में एक जगह राष्ट्रगान को बजाते हुए दिखाया गया था। फिल्म देखते वक्त लोग इसके सम्मान में खड़े नहीं होते थे इसे लेकर मध्यप्रदेश निवासी श्याम नारायण चौकसे ने एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इसी याचिका का निपटारा करते वक्त दिया गया है।

क्या राष्ट्रगान को सिनेमाघरों में अनिवार्य करके जनमानस में देश के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना का संचार किया जा सकता है? क्या सिनेमाघर वो उपयुक्त जगह है जहाँ यह उद्देश्य पूर्ण होता है? जब किसी फिल्म में राष्ट्रगान बजता है तो दर्शक उसके सम्मान में खड़े नहीं होते हैं तो फिर यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि दर्शकों ने खड़े होकर सम्मान जताया या नहीं? दर्शकों पर यह निगरानी कौन रखेगा?

राष्ट्रगान जनमानस में राष्ट्रभक्ति और देशप्रेम का संचार करता है तथा जब यह बजता है तो जनमानस अपने आप ही इसके सम्मान में खड़ा हो जाता है। सामान्यतया यह उसी वक्त बजाया और गाया जाता है जब बात राष्ट्र स्तर के मुद्दों और देश के प्रतिनिधित्व की होती है जैसे खेलकूद की अन्तराष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ और अन्तराष्ट्रीय सम्मलेन, आदि। जब बात देश के लिए होती है तो हर व्यक्ति में देशप्रेम उमड़ पड़ता है फिर चाहे वह क्षणिक ही क्यों न हो। वैसे भी गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर नियमित रूप से हम राष्ट्रगान को गाकर अपनी देशभक्ति का परिचय दे दिया करते हैं।

दरअसल राष्ट्रगान को उचित जगहों एवं उचित समय पर ही गाना और बजाना चाहिए अन्यथा इसकी अति होने से धीरे-धीरे इसका प्रभाव कम होता जायेगा। यह पहली बार नहीं होगा कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाया जायेगा। साठ के दशक में जब चीन से युद्ध हुआ था तब भी भारत सरकार ने सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को बजाया जाना अनिवार्य कर दिया था। शुरू-शुरू में तो यह आदेश प्रभावी रहा परन्तु धीरे-धीरे यह निष्प्रभावी हो गया जिसके कारण उन्नीस सौ अस्सी के लगभग इस आदेश को वापस ले लिया गया। जब यह आदेश उस वक्त प्रभावी नहीं रह पाया तो आज कैसे रह पाएगा? थोपे हुए आदेशों की पालना करवाना बहुत मुश्किल होता है।

राष्ट्रप्रेम सिखानें के लिए सबसे उचित स्थान स्कूल और कॉलेज हैं जहाँ विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। जैसे कच्चे घड़ों को मनपसंद आकार दिया जा सकता है ठीक उसी प्रकार कच्ची उम्र के विद्यार्थियों को देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति के बारे में सिखा सकते हैं। विद्यार्थी जीवन में सीखे हुए संस्कार उम्र भर याद रहते हैं तथा उनका पालन करने का मन भी करता है। अतः सबसे पहले विद्या के इन मंदिरों में राष्ट्रगान का अनिवार्य होना बहुत जरूरी है।

इस देश का संविधान हमें इतने सारे अधिकार देता है तो क्या हमारा देश के लिए कोई कर्तव्य नहीं बनता है? हमें भी तो पूरी तरह से देशभक्त होना चाहिए परन्तु इस देशभक्ति को प्रकट करने के लिए वक्त बेवक्त राष्ट्रगान का गाया और बजाया जाना जरूरी नहीं है। सिर्फ राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रकट करने से ही हमारी देशभक्ति प्रकट नहीं हो जाती। हमें अपनी देशभक्ति का परिचय उन सभी कामों को नकारकर देना होना जो देश के विरुद्ध है।

राष्ट्रगान की अनिवार्यता और देशभक्ति Compulsion of national anthem and patriotism