भारत में जब आजादी के लिए आन्दोलन चल रहा था उस वक्त भारत की आजादी में किसी भी तरह से दिया गया योगदान तथा अपनी मातृभूमि से प्यार देशभक्ति की श्रेणी में आता था। अभी तक भी यही समझा जाता रहा है कि अपने देश से प्यार के साथ-साथ देश की एकता, अखंडता और प्रगति में दिया गया योगदान ही देशभक्ति है।

काले धन के खिलाफ लड़ाई की बातें पिछले कई वर्षों से चलती आ रही है परन्तु किसी भी सरकार ने ईमानदारी के साथ कोई विशेष कदम नहीं उठाया। कल रात प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने जब राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पाँच सौ और एक हजार के नोट तुरंत प्रभाव से बंद करने की घोषणा की तब मुझे पहली बार प्रधानमत्री काले धन के खिलाफ लड़ने के लिए कृतसंकल्प दिखाई दिए।

आखिरकार भारत सरकार ने एनडीटीवी पर एक दिन के घोषित प्रतिबन्ध को स्थगित कर अपनी किरकिरी होने से बचा लिया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये निर्णय तब लिया जब एनडीटीवी सुप्रीम कोर्ट में इस प्रतिबन्ध के खिलाफ याचिका लगा चुका था तथा इस याचिका की सुनवाई आज होनी है।

प्रधानमंत्री को एक हजार और पाँच सौ के बड़े नोट बंद करने की घोषणा किये लगभग दस दिन बीत चुके हैं परन्तु बैंकों में कतारें कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही है। सरकार भी रोज नए-नए नियम लागू कर रही है। कभी तय होता है कि एक दिन में चार हजार रुपये तक बदलवा सकते हैं, कभी उसे बढ़ाकर साढ़े चार हजार कर दिया जाता है फिर अब घटाकर दो हजार कर दिया है।

दिल्ली के प्रदूषण की चर्चा काफी वर्षों से हो रही है परन्तु इस पर खासा ध्यान अभी हाल ही के कुछ वर्षों में गया है जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ओड इवन नियम बनाकर उसे परखा। बहुत से लोगों ने इसे सराहा और बहुत से लोगों ने इसको नाकाफी बताया। ओड इवन नियम काफी हद तक राजनितिक रस्साकशी में फँस कर दम तोड़ता हुआ दिखाई दिया।

हम हर वर्ष आजादी का पर्व मनाते हैं परन्तु हमने कभी सोचा है कि क्या जिस आजादी का सपना हमारे आजादी के दीवानों ने देखा था वो आजादी हमने हासिल कर ली है? हमारे महान क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों, संविधान निर्माताओ ने तथा जिन्होंने भी आजादी के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अपने तन, मन और धन से बलिदान दिया, क्या उन्होंने हमारे आज के देश की कल्पना की होगी? क्या हमें लगता है कि हमने सचमुच आजादी प्राप्त कर ली है?